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कश्मीर ही नहीं हिमाचल प्रदेश में भी हो रही केसर की खेती, किसानों को दिया जा रहा प्रशिक्षण

हिमाचल प्रदेश के किन्नौर, चंबा, मंडी, कुल्लू और कांगड़ा जिलों में भी केसर की खेती की शुरूआत की गई है। यहां की जलवायु केसर की खेती के लिए अनुकूल है।

Divendra SinghDivendra Singh   28 July 2021 6:35 AM GMT

कश्मीर ही नहीं हिमाचल प्रदेश में भी हो रही केसर की खेती, किसानों को दिया जा रहा प्रशिक्षण

हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान प्रदेश के कृषि विभाग के साथ मिल कर इस परियोजना पर काम कर रहा है, जिसका उद्देश्य कश्मीर के अलावा अन्य अनुकूल क्षेत्रों में भी केसर की खेती करना है। सभी फोटो: अरेंजमेंट

दुनिया भर में मशहूर केसर की खेती अभी तक कश्मीर में ही होती है, लेकिन अब दूसरे राज्य भी केसर की खेती में आगे आने लगे हैं, ऐसी ही पहल हिमाचल प्रदेश में भी शुरू हुई।

हिमाचल प्रदेश में चंबा जिले के भरमौर गाँव के किसान धीरज कुमार (40 वर्ष) ने भी लगभग एक बीघा खेत में केसर लगाया है। धीरज कुमार बताते हैं, "मैं पिछले कई साल से जड़ी-बूटियों की खेती कर रहा हूं, फिर मुझे पता चला कि केसर की खेती की ट्रेनिंग दी जा रही है, मैंने सोचा कि इसे भी करना चाहिए। हमें ट्रेनिंग दी गई और वहीं से केसर के बीज भी दिए, खेत पहले से ही तैयार था, जिसे खेत में लगा दिया। पिछली बार तो अभी 10 ग्राम के बराबर केसर मिला है, लेकिन धीरे-धीरे सीख रहा हूं, आगे और भी बढ़िया उत्पादन मिल सकता है।"

जड़ी-बूटियों की खेती करने वाले धीरज कुमार अब केसर की खेती भी करने लगे हैं।

हिमाचल प्रदेश में केसर की खेती को बढ़ावा देने में पालमपुर में स्थित सीएसआईआर-हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान का अहम योगदान है। यहां के वैज्ञानिक प्रदेश कई जिलों में किसानों को केसर की खेती के लिए प्रशिक्षित कर रहे हैं।

धीरज कुमार की तरह ही किन्नौर जिले के मेबर गाँव के किसान परमेश्वर सिंह (57 वर्ष) ने भी पिछले साल ट्रेनिंग लेकर केसर की खेती शुरू की है। परमेश्वर सिंह कहते हैं, "मैं तो पिछले कई साल से राजमा, मटर और बागवानी में सेब, अखरोट की खेती करता आ रहा हूं, और मैं अपने खेत में जैविक तरीके से ही फसलें उगाता हूं, जब मुझे केसर की खेती के बारे में पता चला तो मैंने भी ट्रेनिंग लेकर पिछले साल खेती शुरू कर दी है।"

किन्नौर जिले के मेबर गाँव के किसान परमेश्वर सिंह के खेत में केसर

वो आगे कहते हैं, "हमारा खेत जहां पर है वो लगभग 5,000 फीट पर है, वहां तो लगाया ही, इस बार थोड़ा और ऊपर अपने दूसरे खेत जोकि 8,000 फीट पर है, वहां भी इस बार कुछ बीज लगाए हैं, शायद वहां और अच्छा उत्पादन मिल जाए।"

हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान प्रदेश के कृषि विभाग के साथ मिल कर इस परियोजना पर काम कर रहा है, जिसका उद्देश्य कश्मीर के अलावा अन्य अनुकूल क्षेत्रों में भी केसर की खेती करना है।

हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान के वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक व परियोजना समन्वयक डॉ. राकेश कुमार हिमाचल प्रदेश में केसर की खेती की शुरूआत के बारे में बताते हैं, "अभी तक देश में सिर्फ कश्मीर में केसर की खेती होती है, जबकि हिमाचल प्रदेश के कुछ जिलों की जलवायु केसर की खेती के लिए ठीक है, इससे हमें लगा कि हम किसानों को ट्रेनिंग देकर यहां पर भी केसर की खेती शुरू कर सकते हैं। लगभग एक साल से हमने इस प्रोजेक्ट को शुरू किया है, जिसमें हम किसानों को न केवल ट्रेनिंग देते हैं, साथ ही उन्हें बीज भी उपलब्ध कराते हैं।"

चंबा जिले के भरमौर गाँव में केसर

हिमाचल प्रदेश के किन्नौर, चंबा, मंडी, कुल्लू और कांगड़ा जिलों में अभी केसर की खेती की शुरूआत की गई है। डॉ. राकेश कुमार कहते हैं, "इस बार अभी हमने लगभग 70 किसानों को ट्रेनिंग दी है, इसके साथ ही हम हिमाचल प्रदेश कृषि विभाग के अधिकारी, कृषि विकास अधिकारी, एग्रीकल्चर एक्सटेंशन अधिकारी, उप निदेशक जैसे लोगों को भी ट्रेनिंग देते हैं, जोकि सीधे किसानों के संपर्क में रहते हैं, उन्हीं के जरिए हम किसानों को सेलेक्ट करते हैं और बीज बांटते हैं।"

आईएचबीटी के अनुसार, अभी श्रीनगर के पम्पोर और जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में केसर की होती है। भारत में हर साल 100 टन केसर की मांग रहती है, लेकिन अभी 2,825 हेक्टेयर क्षेत्र में 6.46 टन उत्पादन ही होता है। विश्व में सालाना 300 टन केसर का उत्पादन होता है, केसर उत्पादन में इरान पहले नंबर पर है, जबकि स्पेन और भारत दूसरे व तीसरे नंबर पर आते हैं।


डॉ. राकेश आगे बताते हैं, "इस बार की तरह ही पिछले साल भी हमने किन्नौर, चंबा, कुल्लु, मंडी और कांगड़ा जिले में किसानों को ट्रेनिंग दी थी और पायलट के तौर पर 2.5 एकड़ में केसर के बीज लगाए गए थे। हमने कृषि विभाग को बीज उपलब्ध कराया था और उन्होंने ही बीज बांटे थे।"

केसर की गुणवत्ता और इसकी कीमत तीन मार्कर कंपाउंड्स क्रोसिन (रंग के लिए जिम्मेदार), पिक्रोक्रोसीन (स्वाद के लिए जिम्मेदार) व सैफ्रानाल (सुगंध के लिए जिम्मेदार) की उपलब्धता पर निर्भर करती है।

केसर की खेती समुद्र तल से लगभग 1500-2800 मीटर ऊपर के क्षेत्र में होती है, जहां पर सर्दियों में बर्फ गिरती हो, ऐसा वातावरण फूलों के खिलने और बढ़िया उत्पादन के लिए मददगार साबित होते हैं। सितम्बर से अक्टूबर का महीना केसर के कंद लगाने का सही समय होता है।

कुल्लु के बागा सरहन गाँव में महिला किसान और युवाओं को ट्रेनिंग दी गई।

आईएचबीटी के निदेशक डॉ संजय कुमार कहते हैं, "संस्थान हिमाचल प्रदेश के राज्य कृषि विभाग के साथ एक परियोजना पर काम कर रहा है, जिसका उद्देश्य कश्मीर से परे केसर की खेती करना है, जो भारत को केसर उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक कदम है।"

उन्होंने यह भी कहा कि आगे भी इस तरह के प्रशिक्षण क्षेत्र में किसानों की जागरूकता और क्षमता निर्माण के लिए आयोजित किए जाएंगे। सीएसआईआर- हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान द्वारा गैर परंपरागत क्षेत्रों में केसर की कृषि प्रौद्योगिकी पर आयोजित किए जा रहे प्रशिक्षण शिविरों में महिलाओं की काफी भागीदारी देखने को मिल रही है।

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