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एक सरकारी आदेश ने मिर्जापुर के सैकड़ों भूमिहीन आदिवासी किसानों को मुश्किल में डाल दिया

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में सिंचाई विभाग ने सिरसी बांध के पास खेती के लिए दी गई जमीन के पट्टे को इस साल 31 मार्च से रद्द कर दिया है। इससे जिले के आदिवासी किसान खासे परेशान हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी वे इस जमीन पर खेती करते आ रहे थे जो उनकी आमदनी का एकमात्र जरिया भी था, जिसे अचानक से उनसे छीन लिया गया।

Brijendra DubeyBrijendra Dubey   2 Aug 2021 4:41 AM GMT

बनकी (मिर्जापुर), उत्तरप्रदेश। बनकी गांव के भूमिहीन आदिवासी किसान राजमन ने रोते हुए कहा, "मैं 70 साल का हूं। अपने लिए नौकरी ढूंढने के लिए दिल्ली या बंबई (मुंबई) नहीं जा सकता। मुझे कौन काम देगा?"

राजमन उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले की मडिहान तहसील में रहते हैं। जहां एक आधिकारिक सर्कुलर ने राजमन के गांव सहित कई आदिवासी बस्तियों को झकझोर कर रख दिया है। सरकार से पट्टा लेकर सिरसी बांध के पास की जमीन पर खेती करने वाले सैकड़ों भूमिहीन आदिवासी किसानों को परेशानी में डाल दिया है। वे शिकायत करते हैं कि उनकी आमदनी का एक मात्र जरिया भी उनसे छीन लिया गया है।

राजमन ने गांव कनेक्शन को बताया, "मैंने इस जमीन को जोतते हुए अपनी सारी जिंदगी बिता दी। मेरी सरकार से सिर्फ इतनी गुजारिश है कि हमें यहां खेती करने दें।"। वह निराश होकर कहते हैं, "मेरे पास कोई काम नहीं है, मैं बर्बाद हो गया हूं।" वह आगे बताते हैं कि इस जमीन से ही उन्होंने अपने दस बच्चों और पोते-पोतियों का पेट भरा है।


सिरसी बांध मिर्जापुर के मढिहान, पटेहरा, लालगंज और हलिया ब्लॉक को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराता है। 70 साल पहले, जब राजमन का जन्म हुआ था, उसी साल 1951 में बांध के निर्माण के लिए आदिवासी परिवारों सहित स्थानीय ग्रामीणों की जमीन का अधिग्रहण किया गया था। यह बांध 1958 में चालू हुआ था।

तभी से राज्य सरकार का सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग, किसानों को खेती के लिए 5 साल तक के लिए कॉन्ट्रेक्ट पर पट्टा भूमि आवंटित करता आ रहा है। विभाग ने 31 मार्च 2021 से सभी पट्टा भूमि पर की जाने वाली खेती को रोकने के सरकारी आदेश की जानकारी देते हुए एक सर्कुलर जारी किया।


ऊपर से आदेश

जब गांव कनेक्शन ने यह पता लगाने की कोशिश की कि सरकार ने ऐसा निर्देश क्यों जारी किया? तो सिंचाई कार्य विभाग के अधीक्षण अभियंता रमेश प्रसाद ने कहा कि पट्टा रद्द करने के लिए 'ऊपर से आदेश' मिले हैं। उन्होंने कहा कि ये सरकार का नीतिगत मामला है और सरकार जो भी आदेश देगी वह उसका पालन करेंगे।


यहां लोगों में घबराहट है क्योंकि सिरसी बांध के पास 16 गांव के हजारों निवासियों जिनमें से कई भूमिहीन आदिवासी हैं, जिनकी आमदनी का एकमात्र जरिया ये जमीन ही थी, जिस पर खेती कर वे अपना गुजारा कर रहे थे। जमीन पर खेती न कर पाने से तो उनका भविष्य अंधकार में चला जाएगा।

सिरसी बांध ब्लाक में, सिंचाई विभाग के तत्कालीन कार्यकारी अभियंता मिथिलेश कुमार ने गांव कनेक्शन को बताया, "सिरसी बांध के अंतर्गत 10,832 एकड़ (लगभग 4,384 हेक्टेयर) जमीन आती है जिसमें तालाब, सड़कें गांव और जलमग्न क्षेत्र शामिल हैं। इस जमीन पर लगभग 1200 से 1500 किसान खेती करते थे।"


सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग, सिरसी की ओर से मार्च माह में दो आंतरिक सर्कुलर जारी किए गए। 17 मार्च को एक पत्र जारी किया गया, जिसमें 31 मार्च 2021 तक सभी पट्टों को रद्द करने की जानकारी दी गई थी और कहा गया कि जो कोई भी इस जमीन पर खेती करता हुआ मिलेगा उस पर मुकदमा चलाया जाएगा।

24 मार्च 2021 को एक दूसरा सर्कुलर जारी किया गया। जिसमें कहा गया था कि विभाग को गैर पट्टाधारकों द्वारा जमीनों पर अवैध रूप से खेती करने की शिकायतें मिल रही हैं। जो कोई भी इन जमीनों को हथियाने की कोशिश करता पाया गया उसके खिलाफ़ कार्रवाई की जाएगी।

कई आदिवासी किसानों के लिए सब खत्म हो गया

सिरसी बांध ब्लॉक 2 के एक कार्यकारी अभियंता ने, 24 मई को किसानों, आदिवासी पट्टाधारकों, ग्राम प्रधानों और इस क्षेत्र में खेती से जुड़े अन्य सभी लोगों को आधिकारिक पत्र जारी किया गया था। इसमें कहा गया था कि सिंचाई विभाग द्वारा दिए गया पट्टा 31 मार्च 2021 से रद्द कर दिया गया है। वरिष्ठ अधिकारियों के अगले आदेश तक कोई और नया पट्टा नहीं दिया जाएगा। आदेश को न मानने वालों के खिलाफ जुर्माना लगाया जा सकता है या कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।


किसान असमंजस में हैं। बनकी गांव की निवासी आशा ने गांव कनेक्शन को बताया," जहां तक मुझे याद है सिरसी बांध के पास इन जमीनों पर सरकार से पट्टा लेने के बाद से ही मेरा परिवार यहां खेती करता आ रहा है। 30 साल की आदिवासी महिला आशा बताती हैं कि इस जमीन पर बहुत पहले,उनके पूर्वज सालों से रहते आए थे और खेती करते आए थे।"

इन आदिवासी किसानों के अनुसार जब सरकार ने बांध बनाने के लिए जब जमीन ली थी तो उसने स्थानीय किसानों को पट्टे के आधार पर जमीन पर खेती करने की अनुमति देने का वादा किया था। सिंचाई विभाग पांच साल के लिए एक परिवार को 1000 रुपये प्रति बीघा की दर से दो बीघा (एक बीघा 0.25 हेक्टेयर) से अधिक भूमि आवंटित नहीं करेगा और हर बार जब पट्टे का नवीनीकरण किया जाएगा तो यह जरुरी नहीं कि किसान को पहले वाली जमीन आवंटित की जाए।

वह शिकायती लहजे में कहते हैं, लेकिन सर्कुलर जारी कर अब सरकार अपनी बात से मुकर गई है। आदिवासी किसानों ने सरकार के साथ समझौते के प्रमाण के रूप में गांव कनेक्शन को अपने दशकों पुराने पट्टा दस्तावेज़ दिखाए।

आशा अफसोस जताते हुए कहती हैं, "मेरे सास-ससुर सालों तक यहां खेती करते रहे थे लेकिन अब वो जिंदा नहीं हैं। उनके बाद से हम ही इस जमीन को जोत रहे हैं और आज हमें ऐसा करने से मना किया जा रहा है।" उनके पति जीवन यापन के लिए कालीन बुनते थे। लेकिन हाथ में चोट लगने के बाद से यह काम भी बंद हो गया है।


आशा ने कहा कि उसके चार छोटे बच्चे हैं और उसे नहीं पता कि वो अब उन्हें कैसे पालेगी। डरे हुए किसान ने कहा, "सरकारी पत्र में चेतावनी दी गई है कि जो कोई भी आदेश (पट्टा रद्द करने का आदेश) को न मानते हुए उस जमीन पर खेती करेगा, उसे जेल जाना होगा "

बनकी में अधिकांश परिवार अब दूसरों के खेतों में खेतिहर मजदूर के रूप में काम कर अपना और अपने बच्चों का पेट भर रहे हैं।

राजमन के मुताबिक, जब सरकार ने बांध बनाने के लिए आदिवासियों से जमीन ली थी तो बदले में उन्हें कहीं और जमीन देने की पेशकश की गई थी। वह बताते हैं, "लेकिन मेरे पिता ने जमीन नहीं लेने का फैसला किया। फिर सरकार के साथ यह समझौता हुआ कि वे वही रहेंगे और पट्टा भूमि पर उन्हें खेती करने की अनुमति दी जाएगी।" राजमन आगे कहते हैं,"हमने इस जमीन पर खेती की और अपना जीवन यापन किया है। लेकिन अब सब खत्म हो गया है।"

रोजी रोटी छिन गई

सरकारी आंकड़े कहते हैं कि लगभग 1200 से 1500 किसान पट्टा भूमि पर खेती कर रहे हैं। लेकिन बांकी गांव के दीपक सिंह ने गांव कनेक्शन को बताया, "लगभग 10,000 भूमिहीन आदिवासियों का जीवन यापन इस जमीन से जुड़ा हुआ है। (अधिकारिक तौर पर सिरसी जलाशय के पास पट्टे पर खेती करने वालों की संख्या कम बताई गई), दीपक सिंह की पत्नी ग्राम प्रधान हैं।

सिंह बताते हैं, "सिंचाई विभाग के अधिकारियों ने 17 और 23 मार्च को नोटिस जारी किया और मई में एक बार फिर से नोटिस दिया कि हमारे गांव के लोग अब खेती नहीं कर पाएंगे और सभी पट्टे रद्द कर दिए गए हैं।" दीपक सिंह कहते हैं कि यह आदेश उन आदिवासी किसानों के लिए विनाशकारी है जिनके पास आमदनी को कोई ओर जरिया नहीं है। जब से सरकार ने बांध बनाने के लिए उनकी जमीन ली थी तबसे वे इसी पट्टा भूमि पर निर्भर थे।


दीपक सिंह के मुताबिक इस साल 8 मई को मड़िहान तहसील के रामपुर रेक्सा गांव में आदिवासियों की पंचायत बैठक की गई। यह बैठक गांव के गणेश मंदिर के परिसर में की गई थी। सिंह ने बताया, "बैठक में मौजूद ऊर्जा राज्य मंत्री रामशंकर पटेल ने किसानों को आश्वासन दिया था कि वे बांध के पास की पट्टा भूमि पर खेती जारी रख सकते हैं और पुलिस उन्हें परेशान नहीं करेगी।"

सिंह ने गांव कनेक्शन को बताया कि जब आदिवासी किसान खेती करने के लिए वहां गए तो सिंचाई विभाग के गश्तीदल ने उन्हें धमकी दी कि अगर यहां कोई खेती करता पाया गया तो पुलिस में रिपोर्ट की जाएगी। उन्होंने आगे कहा, आदिवासी किसानों को जमीन जोतने से रोककर, सरकार ने ठीक नहीं किया है।

गांव कनेक्शन ने इस संबंध में ऊर्जा राज्य मंत्री रामशंकर पटेल से बात करने की कोशिश की, उन्होंने कहा, "अभी वो बाहर हैं, मिलकर बात करेंगे।"

इस बीच राजमन के चेहरे पर चिंता की रेखाएं और गहरी होती जा रही हैं। क्योंकि वह और उनके जैसे सैकड़ों अन्य लोग ये जानना चाहते हैं कि वास्तव में उनके लिए क्या योजना बनाई गई है।इस सरकारी आदेश के बाद कि जब तक पटटे का नवीनीकरण नहीं किया जाता तब तक वे इस पर खेती नहीं कर सकते। ऐसे में अधिकारियों के पास उनके जीवन यापन के लिए कोई वैकल्पिक योजना है, उसकी उन्हें कोई खबर नहीं है।

अनुवादः- संघप्रिया मौर्य

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