पश्चिम बंगाल चुनाव: केंद्र और राज्य सरकार के बीच की राजनीतिक लड़ाई का खामियाजा भुगत रहे हैं किसान

पश्चिम बंगाल के किसान केंद्र सरकार और राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के बीच फंस गए हैं। किसानों का मानना है कि राज्य सरकार जानबूझ कर उन्हें केंद्र सरकार की पीएम किसान सम्मान निधि योजना का लाभ लेने नहीं दे रही है।

Gurvinder SinghGurvinder Singh   22 April 2021 1:45 PM GMT

हुगली (पश्चिम बंगाल)। 60 वर्षीय आनंद मोहन घोष की बीते कई रातों से नींद हराम है। घोष ने पश्चिम बंगाल के पतरा गांव में चार बीघा (0.53 हेक्टेयर) जमीन पर आलू की खेती की थी, लेकिन उन्हें इसमें घाटा हो गया। एक तरफ उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है, वहीं दूसरी तरफ वे कर्ज के बोझ तले भी दबे हुए हैं। ऋणदाताओं द्वारा उन पर कर्ज अदा करने को लेकर लगातार दबाव बनाया जा रहा है।

घोष ने रुंधे गले से गांव कनेक्शन को बताया, "मैंने आलू की खेती के लिए लगभग 35,000 रुपये का कर्ज लिया था। मुझे उम्मीद थी कि अच्छा लाभ होगा। लेकिन बीज की लागत अधिक होने और आलू की फसल की कीमत कम होने की वजह से मुझे नुकसान हो गया। अब मेरे जैसे अधिकांश सीमांत किसानों के पास कर्ज चुकर्ज काने के लिए खेतों में मजदूर के रूप में काम करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।

घोष राज्य की राजधानी कोलकाता से लगभग 65 किलोमीटर दूर हुगली जिले में रहते हैं। वे कहते हैं, "राज्य सरकार हमें कृषक बंधु [किसान मित्र] योजना के तहत प्रति वर्ष पांच हजार रुपये दे रही है, लेकिन हमें अभी तक पीएम किसान [प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि] के तहत छह हजार रुपये मिलना बाकी है। दोनों ही सरकारें किसानों के नाम पर राजनीति कर रही है।" किसानों का ऐसा मानना है कि राज्य सरकार जानबूझ कर उन्हें केंद्र सरकार की पीएम किसान सम्मान निधि योजना का लाभ नहीं लेने दे रही है।

आनंद मोहन घोष। सभी तस्वीरें- गुरविंदर सिंह

हुगली जिले के मलिया गाँव के 32 वर्षीय किसान संतू दास ने गाँव कनेक्शन को बताया, "उन्होंने (वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने) हमें हमारे अधिकारों से वंचित कर दिया है। हमें राज्य और केंद्र सरकार, दोनों के ही योजनाओं के लाभ की आवश्यकता है, क्योंकि बढ़ती उत्पादन लागत के कारण भारी नुकसान का सामना करना पड़ता है। लेकिन, राजनीतिक दलों को केवल अपनी राजनीति से ही मतलब है।"

किसान कल्याण योजनाओं के पीछे की राजनीति

साल 2019 के अंतरिम बजट के दौरान, केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की घोषणा की थी। इसके तहत भूमि रखने वाले किसानों को न्यूनतम आय सहायता के रूप में तीन समान किस्तों में एक वर्ष में 6,000 रुपए की राशि सीधे उनके बैंक खातों में जमा किया जाना था।

साल 2019-20 में, लगभग साढ़े 14 करोड़ किसानों को इस योजना का लाभ मिला। केंद्र ने इसके लिए 872.175 बिलियन रुपये (872175000000 रुपये) आवंटित किए थे। लेकिन, पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने इस योजना को लागू नहीं किया।

इस बीच, राज्य सरकार ने कहा कि उसने दिसंबर 2018 में किसानों के हितों का ध्यान रखते हुए 'कृषक बंधु' (किसानों का मित्र) योजना की शुरुआत की है। इसके तहत कहा गया कि किसानों को दो किस्तों में प्रति एकड़ (0.4 हेक्टेयर) खेती के लिए सालाना 5,000 रुपये का भुगतान किया जाएगा। इसी तरह, एक एकड़ से कम जमीन वाले किसानों को 1,000 रुपये का भुगतान किया जाएगा।

खेत में लगे राजनीतिक पार्टियों के झंडे

इतना ही नहीं, राज्य ने 18 से 60 वर्ष की आयु के बीच कमाऊ परिवार के सदस्य (किसान) की मृत्यु के मामले में 2 लाख रुपये के जीवन बीमा कवर की घोषणा भी की। इस कवर का लाभ उठाने के लिए किसानों को कोई प्रीमियम देने की आवश्यकता नहीं थी। इस योजना का मकसद पश्चिम बंगाल में 72 लाख किसानों और बटाईदार परिवारों को इसका लाभ देना है।

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), इस विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में अपनी पैठ बनाने की पूरी कोशिश कर रही है। इसके लिए उन्होंने राज्य सरकार पर किसानों को पीएम-किसान योजना का लाभ नहीं देने का आरोप लगाते हुए इसे प्रमुख चुनावी मुद्दा बना दिया है। भाजपा द्वारा किसानों की दुर्दशा की अनदेखी का आरोप लगाते हुए विशेष रूप से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को निशाना बनाया जा रहा है।

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इस मामले पर विपक्ष की गंभीर आलोचना को देखते हुए राज्य सरकार ने, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले, जनवरी 2021 में पीएम-किसान योजना को लागू करने की अनुमति दे दी। मुख्यमंत्री बनर्जी ने कहा कि उनकी सरकार ने सहायता के लिए केंद्र सरकार के पोर्टल पर पंजीकरण करने वाले किसानों का विवरण मांगा था। उन्होंने दावा किया कि बंगाल के लगभग 21.7 लाख किसानों ने योजना का लाभ उठाने के लिए पहले ही अपना पंजीकरण करवा लिया था। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अगर पैसा सीधे किसानों को हस्तांतरित होता, तो राज्य सरकार को इसमें कोई समस्या नहीं होती।

किसानों का गुस्सा

इस साल हुगली जिले के आलू उगाने वाले किसान गुस्से में हैं। हुगली के बागानबाटी गाँव में दो बीघा (0.26 हेक्टेयर) जमीन पर आलू की खेती करने वाले 60 वर्षीय अजीत रूईदास ने गांव कनेक्शन को बताया, "पंजाब में मिलने वाली अच्छी गुणवत्ता की 50 किलो बीज की कीमत लगभग 5000 रुपये है। फर्टिलाइजर की कीमत दो हजार रुपये प्रति बैग है। इसी तरह मजदूरी लागत 200 से 250 रुपए प्रतिदिन है।"


"हम एक बीघा जमीन [0.13 हेक्टेयर] पर आलू की खेती करने के लिए लगभग तीस हजार रुपए खर्च करते हैं। इसमें लगभग 3500 किलोग्राम आलू की पैदावार होती है। सरकार ने इसके लिए छह रुपये किलो का एमएसपी निर्धारित किया है। इसका मतलब है कि हम केवल 21 हजार रुपये ही कमाते हैं। इस तरह हमें एक बीघे में 9000 रुपये का सीधा नुकसान होता है।

इसके अलावा, आलू को गोदामों में ले जाने का अतिरिक्त खर्च भी किसानों को ही उठाना पड़ता है। किसानों का कहना है कि यदि राज्य सरकार उन्हें केंद्र सरकार के पीएम-किसान योजना का लाभ लेने देती, तो कुछ हद तक कम नुकसान होता।

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दूसरी ओर, कुछ ऐसे किसान हैं जो केंद्र सरकार से भी निराश हैं, उनका मानना है कि केंद्र ने भी उनके लिए कुछ खास नहीं किया है। पतरा गांव के ही एक अन्य किसान सीखदेंदु घोष का कहना है, "राज्य सरकार हमें पांच हजार रुपये दे रही है। लेकिन, हमने डेढ़ साल पहले पीएम-किसान निधि के लिए फार्म भरा था, इसके बावजूद आज तक केंद्र सरकार से हमें कुछ भी नहीं मिला है।"

इसके साथ ही किसानों को इस बात की भी शिकायत है कि उर्वरकों की कीमत 1,175 रुपये से बढ़कर 1,975 रुपये हो गई है। इसने भी किसानों को सीधे प्रभावित किया है।

वोट बैंक की राजनीति

पश्चिम बंगाल के किसानों को लगता है कि वे राज्य और केंद्रीय योजनाओं के बीच फंसे हुए हैं। मुख्यमंत्री बनर्जी ने इस साल 17 मार्च को चुनावी घोषणा पत्र जारी करते हुए राज्य के किसानों के लिए एक और वादा किया है।

इस वादे के मुताबिक उन्होंने घोषणा की है कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो किसानों को दोगुनी वार्षिक सहायता राशि यानी 10,000 रुपये दी जाएगी। किसानों का दावा है कि यह महज एक चुनावी हथकंडा है। साउथ 24 परगना जिले के सुंदरबन में दुर्बाचोटी गांव के निवासी किसान सुधांशु श्यामलाल कहते हैं, "वह [ममता] चुनाव जीतने की स्थिति में वित्तीय सहायता को दोगुना करने का वादा कर रही हैं। लेकिन अगर वह नहीं जीतती हैं, तो? इसका मतलब है कि वह इस वादे के साथ केवल वोट हासिल करना चाहती है।"


किसानों के एक वर्ग का कहना है कि केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को चुनाव जीतने के लिए लोकलुभावन वादे करने के बजाय कम लागत वाले बीज और अन्य लाभ प्रदान करके उत्पादकता बढ़ाने में मदद करनी चाहिए। साउथ 24 परगना जिले के दुर्बाचोटी गांव के रहने वाले 32 वर्षीय किसान गौरंगो मैती ने गांव कनेक्शन से कहा, "इन पैसों से शायद ही हमें कोई लाभ होगा। इसके बजाय, सरकार को हमारी आय बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। बिचौलियों की वजह से हमें हमारी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए।" मैती ने आगे कहा, "वे हमें कोई आर्थिक लाभ नहीं देना चाहते, और केवल हमारा वोट खरीदने की कोशिश कर रहे हैं।"

किसान गौरंगो मैती

हालांकि, राजनीति के जानकारों का मानना है कि केंद्रीय पीएम-किसान योजना को लागू नहीं करने के बावजूद तृणमूल कांग्रेस सरकार को इससे कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा।

कोलकाता के राजनीतिक विश्लेषक सिबाजी प्रतिम बसु ने गांव कनेक्शन से कहा, "इसका कुछ असर हो सकता है, लेकिन बंगाल में चुनाव आर्थिक मुद्दों पर बहुत कम ही लड़े गए हैं। अगर ऐसा होता तो वाम मोर्चा बहुत पहले ही सत्ता से बाहर हो गया होता।" उन्होंने कहा कि यदि राज्य सरकार की अन्य सामाजिक कल्याण योजनाओं से किसानों को कृषि सहायता और लाभ प्राप्त होता है, तो एक योजना को लागू नहीं करने से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा।

बहरहाल, दो दलों के बीच की इस राजनीतिक लड़ाई का खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है। उन्हें खेती में घाटा और कर्ज का बोझ जैसी कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन सरकारें उन्हें केवल वोट बैंक के रूप में उपयोग कर रही हैं। किसान चाहते हैं कि उनकी गरिमा और स्वाभिमान बरकरार रहे, और उन्हें उनका काम करने दिया जाए।

इस खबर को अंग्रेजी में यहाँ पढ़ें-

अनुवाद- शुभम ठाकुर

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