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पश्चिम बंगाल चुनाव: असहाय गांव, खेतों में दरार और खारे पानी वाला सुंदरवन जहां जीवन किसी संघर्ष से कम नहीं है

हर बार जब कोई चक्रवात सुंदरवन से टकराता है, तो वहां रहने वाले लोगों का जीवन तहस-नहस हो जाता है। तटबंध टूट जाते हैं और लोगों को बार-बार विस्थापित होना पड़ता है। यहां के लोगों के जेहन में मतदान के समय ये मुद्दे जरूर रहे होंगे।

Gurvinder SinghGurvinder Singh   5 April 2021 10:15 AM GMT

उत्तर गोपालनगर, सुंदरवन (पश्चिम बंगाल)। दक्षिण 24 परगना के उत्तर गोपालनगर गाँव में एक असामान्य और मातमी सन्नाटा पसरा हुआ है। यहां के खेत बंजर हो गए हैं और घास सूख गए हैं। खेतों की मिट्टी जो कभी नमीयुक्त हुआ करती थी, जहां कभी हरे-भरे खेत होते थे, उनमें अब गहरी दरारें पड़ गई हैं। पहले मिट्टी के जिन घरों में जिंदगियां बसती थीं और जहां से लोरी की आवाजें आती थीं, वे अब किसी कंकाल की तरह बेजान स्थिति में खड़े हुए हैं।

70 साल की कुंती दास गांव की इस स्थिति के लिए प्रशासन को जिम्मेदार ठहराती हैं। उन्होंने एक लंबी चुप्पी तोड़ते हुए गांव कनेक्शन से कहा, "एक समय था जब पूरा गाँव मिट्टी के घरों के बाहर खेलने वाले बच्चों की आवाजों से गूंज उठता था। अब यहां केवल 30 से 35 घर ही बचे हैं। बाकी घर प्राकृतिक आपदाओं में नष्ट हो गए हैं।"

कुल 540 मतदाताओं वाला उत्तर गोपालनगर गाँव भारतीय सुंदरवन में पठारप्रतिमा निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आता है। कुंती समेत इस गांव के अन्य लोगों ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के दूसरे चरण में अपना मतदान किया। इस बार के चुनाव में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिल रही है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह गांव लगातार प्राकृतिक आपदाओं और चक्रवातों की चपेट में आता रहता है। जब यहां के लोग मतदान कर रहे होंगे तो तमाम समस्याओं के बावजूद लोगों के पुनर्वास की व्यवस्था का मुद्दा उनके जेहन में प्राथमिकता से रहा होगा।

कुंती दास। (सभी तस्वीरें-गुरविंदर सिंह)

कुंती का दावा है कि सुंदरवन में आइला (2009), बुलबुल (2019) और अम्फान (2020) नामक चक्रवातों की एक श्रृंखला के कारण कम से कम पांच तटबंध नदी में बह गए। कुंती ने आगे कहा, "सरकार इस समय कंक्रीट और सिंडर ब्लॉक तटबंधों का निर्माण कर रही है। पर हमें अभी भी इस बात को लेकर संदेह है कि वे कितने समय तक टिक पाएंगे।"

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पिछले मई में सुंदरवन से अम्फान सुपर चक्रवात टकराया था, जिसकी वजह से इलाके को भारी नुकसान पहुंचा था। इससे प्रभावित लोगों के राहत कार्य की राशि को लेकर पहले से ही दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और तीखी नोकझोंक चल रही है।

23 मार्च को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सुंदरवन में गोसाबा में एक रैली को संबोधित किया। इस रैली में शाह ने सत्तारूढ़ टीएमसी पर आरोप लगाते हुए कहा, "केन्द्र सरकार ने अम्फान चक्रवात से प्रभावित लोगों के लिए राहत राशि भेजी थी। लेकिन तृणमूल कांग्रेस के नेता उसे हड़प गए और उसे जनता तक नहीं पहुंचने दिया।'' उन्होंने मुख्य रूप से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और डायमंड हार्बर से टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी को निशाने पर लिया।

इधर, सत्ता पक्ष ने शाह के इन आरोपों को निराधार बताया है। सुंदरवन मामलों के राज्य मंत्री मंतूराम पाखिरा ने गाँव कनेक्शन को बताया, "राज्य सरकार ने आपदा से प्रभावित लोगों को राहत की राशि वितरित करते समय पूरी पारदर्शिता बरती है। विपक्ष, सत्ता पक्ष की छवि खराब करने की कोशिश कर रहा है। हमारी पार्टी ने राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सभी के लिए समान रूप से काम किया है।"

बनाया जा रहा है गरीबी का मज़ाक

भारत और बांग्लादेश में 40,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला सुंदरवन 40 लाख से अधिक लोगों का घर है। यह अपने विशाल मैंग्रोव वन और 96 रॉयल बंगाल टाइगर्स (जनगणना 2019-20) के लिए जाना जाता है। यहां कुल 102 द्वीपों में से लगभग 54 में मानव बस्तियाँ हैं।

सीमेंट के ब्लॉक जिससे तटबंध बनाये जा रहे हैं।

इस बात को एक साल हो गए हैं, लेकिन तापस दास को आज भी याद है कि नदी की ज्वार की लहरों ने कैसे उन्हें और 14 अन्य लोगों को अम्फान चक्रवात के दौरान डुबो दिया था। यह चक्रवात 260 किलोमीटर प्रति घंटे की हवा की गति के साथ बंगाल की खाड़ी की ओर चला गया, इसकी वजह से पिछले साल 20 मई को जान-माल को भारी नुकसान पहुंचा था।

तापस याद करते हुए गांव कनेक्शन को बताते हैं, "हम नदी के करीब बैठे हुए थे, तभी एक भयंकर लहर आई, जिसने हमें अपने साथ बहा लिया। हमारी किस्मत अच्छी थी, हम सभी तैरना जानते थे और बच गए। लेकिन यह डरावना था।"

यहां सीमेंट और ब्लॉक से उसी तरह का एक अन्य तटबंध बनाया गया है, ताकि प्राकृतिक आपदाओं से गाँव को बचाया जा सके। लेकिन यह तटबंध ही तापस के घर के लिए खतरा बन गया है। दरअसल, उनका घर नदी के पास है और तापस को लगता है कि यह तटबंध मिट्टी के कटाव के चलते उस भूमि को खा जाएगा, जिस पर उनका घर खड़ा है। इधर, सरकार चक्रवात की वजह से प्रभावित लोगों को 20,000 रुपए का मुआवजा स्वीकार करने के लिए कह रही है, लेकिन 46 वर्षीय तापस सरकार से बेहतर पुनर्वास पैकेज चाहते हैं।

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तापस भावुक होकर कहते हैं, "मेरे पांच रिश्तेदारों के घर अम्फान चक्रवात के दौरान पहले ही नदी में बह गये। आज के समय में 20,000 रुपए के मुआवजे से क्या होता है? हमारी गरीबी का मजाक बनाया जा रहा है।"

तापन की पत्नी चोबी दास (45 साल) ने गांव कनेक्शन को बताया, "हमने पिछले दस वर्षों में कम से कम पांच बार अपना घर बदला है क्योंकि मिट्टी के कटाव की वजह से हमारे घर बह गए। हमारे लिए घरों में शौचालय बनाना पैसे की बर्बादी की तरह है, क्योंकि हम नहीं जानते कि कोई घर कब तक टिक पाएगा। उन्होंने आगे कहा, "मेरी दो बड़ी बेटियाँ हैं जिन्हें खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। यह खतरनाक है।"

अम्फान से हुई तबाही के निशां आज भी हैं।

चोबी अपनी इस दुर्दशा के लिए सरकार के उदासीन रवैये को जिम्मेदार ठहराती हैं। वे कहती हैं, "चक्रवात आइला को अब तक बारह साल हो चुके हैं, जब हमने अपना घर खो दिया था। सरकार हमारी समस्याओं के प्रति उदासीन बनी हुई है। कोई ठोस तटबंध बनाने के लिए अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया है। अगर ऐसा होता तो चक्रवात अम्फान ने हमारे जीवन को इस तरह बर्बाद ना किया होता।"

बर्बाद हो गई आजीविका

घातक साइक्लोन आइला के बाद विश्व बैंक ने सुंदरवन तटबंध पुनर्निर्माण परियोजना के लिए 5,032 करोड़ रुपए आवंटित किए थे, ताकि आधुनिक सीमेंट और ब्लॉक तटबंधों का निर्माण किया जा सके। ये तटबंध लगभग पाँच मीटर ऊँचे और 30-40 मीटर चौड़े हैं।

कुंती के तटबंधों की मजबूती पर संदेह करने के पीछे का कारण गंभीर है और यह बेवजह नहीं है। सुंदरवन के रहने वाले कई लोगों ने सरकार पर तटबंध के निर्माण में घटिया गुणवत्ता की सामग्री के इस्तेमाल का आरोप लगाया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इनमें से अधिकांश तटबंध चक्रवात अम्फान के दौरान ढह गए। इसकी वजह से खारे पानी खेतों में घुस गए और खड़ी फसलें नष्ट हो गईं।

तटबंध टूटने से आजीविका का नुकसान होता है। उत्तर गोपालनगर के ज्यादातर किसान, महिलाएं हैं। यहां के पुरुष आजीविका के लिए दूसरे राज्यों में चले गए हैं।

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इस क्षेत्र में एक ही फसल उगाई जाती है। यहां के किसान वर्ष भर व्यक्तिगत उपभोग के लिए वर्षा आधारित फसलें जैसे धान और सब्जियाँ उगाते हैं।

45 वर्षीय किसान अनुश्री दास ने गाँव कनेक्शन को बताया कि उनकी नौ बीघा (1.2 हेक्टेयर) ज़मीन का 75 प्रतिशत हिस्सा पहले ही नदी के कटाव की वजह से बह गया गया है। बची हुई जमीन तटबंध के ढहने के बाद खारे पानी की वजह से अनुपयोगी हो गई है।

कुलताली ब्लॉक के दुअुलबरी गांव में अम्फान से मची तबाही। (फाइल फोटो)

अनुश्री कहती हैं, "खारे पानी हमारे खेतों में घुस आए और इसने मछली पकड़ने व खेती दोनों के लिए ही मिट्टी को बेकार कर दिया।"

30 वर्षीय किसान अर्चना दास ने कहा कि खारे पानी ने मिट्टी की उत्पादन क्षमता को बुरी तरह प्रभावित किया है। वे कहती हैं, "इससे पहले, हमने पाँच बीघा (0.6 हेक्टेयर) में धान की खेती की थी। इसमें प्रत्येक बीघे में 55 किलो के पाँच बोरी धान का उत्पादन हुआ था। अब, कुल भूमि से केवल दस बोरी धान का ही उत्पादन हो पाता है। इतने में मेरे परिवार का गुज़ारा बड़ी मुश्किल से हो पाता है।" अर्चना के परिवार में उनकी सास, पति और दो नाबालिग बेटे शामिल हैं।

अर्चना ने आगे बताया, "फिलहाल मुझे नौकरानी के रूप में भी रोजगार नहीं मिल रहा है, क्योंकि कोरोना संक्रमण के डर की वजह से लोग काम नहीं दे रहे हैं।"

पेयजल की समस्या

यहां पेयजल की भी समस्या बनी हुई है। चोबी ने बताया, "हमें खाना पकाने और नहाने के लिए नलकूप के पानी पर निर्भर रहना पड़ता है। हाल ही में एक गैर-लाभकारी संस्था ने अम्फान आपदा के बाद गांव में एक नलकूप का निर्माण किया है। इससे पहले, हमें पीने का पानी खोजने के लिए कम से कम दो से तीन किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। हमारे गांव के लिए एक नलकूप पर्याप्त नहीं है। हम पानी की अन्य दैनिक जरूरतों के लिए तालाब के खारे पानी पर निर्भर हैं। सरकार ने हमारे लिए कुछ नहीं किया है।"

तपस ओर क्षेत्र की ओर इशारा करके बता रहे हैं जहां उनके जानने वाले पांच लोगा बह गये थे।

इस बीच, विशेषज्ञों का कहना है कि मजबूत तटबंधों का निर्माण कोई समाधान नहीं है। पॉलिसी बॉडी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, कोलकाता के निदेशक नीलंजन घोष ने गाँव कनेक्शन को बताया, "यह एक मिथक है कि इस तरह के मजबूत तटबंध लोगों को सुरक्षा प्रदान करेंगे। सुंदरवन में तटबंध कभी भी एक समाधान नहीं हो सकते हैं, इसके उलट वे टूटने के बाद और अधिक समस्याओं को आमंत्रित करेंगे। इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।"

घोष ने आगे बताया, "असल में द्वीपसमूह मानव निवास के लिए उपयुक्त है ही नहीं। क्योंकि ये इलाके अगले पंद्रह से बीस वर्षों में डूब जाएंगे।"

तलछटीकरण (अवसादन या सेडिमेन्टेशन) के कारण ताजे जल के प्रवाह में कमी आई है और खारा पानी इसकी जगह ले रहा है। इससे जमीन का खारापन बढ़ रहा है और भूमि की उत्पादन क्षमता प्रभावित हो रही है। घोष कहते हैं कि प्राकृतिक आपदाएं बढ़ी हैं, सरकार को इस मुसीबत से लोगों को बचाने के लिए कोई ठोस रणनीति तैयार करनी होगी। इन इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित जगहों पर स्थानांतरित किया जाना चाहिए।

हालांकि, तापस को इस बड़ी समस्या का अंदाज़ा नहीं है। वे बस एक स्थायी घर चाहते हैं ताकि उनकी बेटियों को खुले में शौच के लिए ना जाना पड़े। इसके अलावा वे एक मजबूत तटबंध भी चाहते हैं ताकि आने वाली चक्रवातों से उनके परिवार की सुरक्षा हो सके।

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