उत्तराखंड हादसा : जहां से गांव वालों को चारापत्ती उठाने की इजाज़त नहीं वहां इतना बड़ा प्रोजेक्ट कैसे बना?

उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा के बाद ज़्यादा ऊंचाई पर बन रहे बांधों और विद्युत परियोजना पर भूवैज्ञानिकों और गांव वालों ने सवाल उठाने शुरु कर दिए हैं। ये जगह इतनी संवेदनशील है कि गांव वालों को यहां से पशुओं के लिए चारा इकट्ठा करने पर भी मनाही है। गांव वालों का कहना है कि जिस जगह पर उन्हें चारापत्ती तक उठाने की इजाज़त नहीं वहां इतना बड़ा विद्युत् प्रोजेक्ट कैसे बना?

Deepak RawatDeepak Rawat   8 Feb 2021 1:14 PM GMT

उत्तराखंड हादसा : जहां से गांव वालों को चारापत्ती उठाने की इजाज़त नहीं वहां इतना बड़ा प्रोजेक्ट कैसे बना?चमोली जिले में रविवार को ग्लेशियर फटने से बड़ी तबाही के बाद नियम शर्तों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। फोटो-प्रतीकात्मक

चमोली/देहरादून। 7 फ़रवरी की सुबह करीब 11 बजे रेणी गांव में भगदड़ मच गई जब उन्होंने धूल का एक बड़ा गुबार देखा। ये गुबार रेणी गांव के नज़दीक हुए हिमस्खलन से पैदा हुआ था। गांव के बुज़ुर्गों की आंखों के सामने 50 साल पहले अलकनंदा नदी में आई प्रलयकारी बाढ़ का मंज़र घूम गया। उस वक्त आई बाढ़ ने इस पूरे इलाक़े को तबाह कर दिया था। तबाही के बाद, ज़िला मुख्यालय को चमोली से हटाकर गोपेश्वर बना दिया गया।

इस तबाही के बाद भी सरकार की आंखें तो नहीं खुली लेकिन यहां के लोगों की आंखें ज़रूर खुल गईं। उनकी समझ में आ गया कि पेड़ों के बिना उनका अस्तित्व मिट जाएगा। इसीलिए जब इस तबाही के चार साल बाद, 1974 में सरकार ने रेणी गांव के आसपास के लगभग 2,500 पेड़ों को काटने का फ़र्मान जारी किया तो यहां के लोगों ने उसका विरोध किया। इसी विरोध ने रेणी गांव में जन्म दिया 'चिपको आंदोलन' को। पुरुषों की ग़ैर मौजूदगी में जब ठेकेदार ने पेड़ काटने की कोशिश की तो रेणी गांव की महिला महिला गौरा देवी 21 अन्य महिलाओं के साथ पेड़ों से चिपक गईं।

इस घटना को लगभग 46 साल बीत चुके हैं चिपको आंदोलन वाला रेणी गांव एक बार फिर दुनिया की नज़रों में है। प्रकृति के लिए लड़ने वाली गौरा देवी का गांव ख़ुद प्राकृतिक आपदा का शिकार बन चुका है।

जोशीमठ में हुई प्राकृतिक आपदा ने एक बार फिर 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद बनी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 2014 में बनी रवि चोपड़ा कमेटी की सिफ़ारिशों की याद दिला दी। इस कमेटी ने खतरे की आशंका को भांपते हुए अलकनंदा और भागीरथी पर बनी 23 जलविद्युत परियोजनाओं को बंद करने की सिफारिश की थी।- एसपी सती, भूभर्गशास्त्री

उत्तराखंड में पहाड़ी नदियों को रोककर बनाए जा रहे पॉवर प्रोजेक्ट को लेकर पर्यावरण विद हमेशा से सवाल उठाते रहे हैं।

डिपार्टमेंट ऑफ़ डिजास्टर मैनेजमेंट में तैनात एक सरकारी अधिकारी और भूभर्ग वैज्ञानिक ने नाम न बताए जाने की शर्त पर गांव कनेक्शन को बताया कि वहां पर या ज़्यादा ऊंचाई वाले इलाक़ो में अक्सर हिमनदीय झील बन जाती है। अभी तक यही कह सकते हैं कि वहां ज़रूर कोई बहुत बड़ा हिमस्खलन हुआ होगा जो इस झील से टकराया होगा। जिसके बाद वो झील को तोड़ते हुए सीधा पॉवर प्रोजेक्ट से टकराया और इस आपदा का कारण बना होगा।

इस प्राकृतिक आपदा का सबसे बड़ा शिकार बना 2006 से बन रहा ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट और तपोवन विष्णुगाड पावर प्लांट। आपको बता दें ऋषिगंगा पावर प्लांट रैणी गांव में स्थित 11 मेगावाट का प्रोजेक्ट है जो कि धौलीगंगा नदी में स्थित है और इसी के आगे कुछ ही दूरी पर तपोवन में तपोवन विष्णुगाड पावर प्लांट है जो 520 मेगावाट क्षमता का है। यो दोनों ही प्रोजेक्ट तबाह हो चुके हैं।

जिन्होंने 1970 की बाढ़ नहीं देखी थी उनकी आंखों के सामने 2013 की केदारनाथ त्रासदी का मंज़र घूम गया। जोशीमठ में धौलीगंगा का जल स्तर 1,388 मीटर तक पहुंच गया जबकि 2013 केदारनाथ आपदा के समय जल स्तर 1,385.5 तक पंहुचा था। प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि एक बहुत बड़े ग्लेशियर के टूटकर गिरने और ऋषिगंगा पावर प्लांट के टकराने से ये भीषण आपदा आई है।


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हिमस्खलन होने का कारण

फ़रवरी के महीने में हुए इस हिमस्खलन ने हर किसी को अचंभे में डाल दिया है। ये वही इलाक़ा है जहां दो दिन पहले तक जमकर बर्फ़ गिर रही थी। आख़िर वहां हिमस्खलन कैसे हो गया, किस तरह इन दिनों ग्लेशियर टूट गया?

ग्रामीणों का कहना है कि इस तरह की प्राकृतिक आपदा तभी आती है जब प्रकृति के साथ छेड़छाड़ की गई हो। भूवैज्ञानिकों के मुताबिक दरअसल नीति घाटी से निकलने वाली धौलीगंगा नंदा देवी बायोस्फियर रिज़र्व का एक अहम हिस्सा है जो कि बेहद ही संवेदनशील है और नंदा देवी बफ़र ज़ोन का हिस्सा है जिसमे छेड़छाड़ किसी भी कीमत पर नहीं होनी चाहिए।

साल 2019 में इसी इलाके में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने रेणी गाँव के लोगों की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए इस इलाके में बाँध बनाने के लिए डायनामाइट के विस्फोट पर प्रतिबंध लगा दिया था।

भूभर्गशास्त्री एसपी सती गांव कनेक्शन से बात करते हुए कहते है, "जोशीमठ में हुई प्राकृतिक आपदा ने एक बार फिर 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद बनी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 2014 में बनी रवि चोपड़ा कमेटी की सिफ़ारिशों की याद दिला दी। इस कमेटी ने खतरे की आशंका को भांपते हुए अलकनंदा और भागीरथी पर बनी 23 जलविद्युत परियोजनाओं को बंद करने की सिफारिश की थी।"

आपको बता दें कि उस वक़्त चोपड़ा कमेटी ने कहा था कि वन्यजीव संरक्षित क्षेत्रों मसलन, राष्ट्रीय पार्कों और इको-सेंसिटिव ज़ोन में जल विद्युत् परियोजना के निर्माण की अनुमति नहीं देनी चाहिए। समिति ने ये भी कहा था कि ढाई हज़ार मीटर से ज़्यादा ऊंचाई वाले क्षेत्र वन्यजीवों के आवास है और उच्च जैव विविधता वाले स्थल होने के साथ ही बेहद नाज़ुक हैं।

समिति ने दो मेगावाट से बड़ी परियोजनाओं के लिए पर्यावरण क्लीयरेंस ज़रूरी करने और विंटर स्नोलाइन से ऊपर के इलाकों में यानी 2,200 से 2,500 मीटर तक की ऊंचाई वाले इलाकों में किसी भी विद्युत् परियोजना की इजाज़त नहीं देने को कहा था। हैरानी की बात है कि उस वक़्त केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय इस कमेटी की कई सिफारिशों के विरोध में और बड़े बांध के पक्ष में था। यह बताना भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि चमोली के कईं इलाके सिस्मिक ज़ोन चार और पांच में आते हैं। यानी ये पूरा इलाका भूकम्प के नज़रिये से बेहद ही संवेदनशील है।

फ़रवरी के महीने में हुए इस हिमस्खलन ने हर किसी को अचंभे में दाल दिया है। ये वही इलाक़ा है जहां दो दिन पहले तक जमकर बर्फ़ गिर रही थी। आख़िर वहां हिमस्खलन कैसे हो गया, किस तरह इन दिनों ग्लेशियर टूट गया?

जोशीमठ के स्थानीय निवासी, भूभर्ग वैज्ञानिक और पिछले कई वर्षो से लगातार इको सेंसिटिव ज़ोन में बन रहे बांधों का विरोध करे रहे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) की राज्य कमेटी के सदस्य अतुल सती बताते है, "ये प्राकृतिक आपदा लगातार अंधाधुंध विस्फोटों और आपदा वाले क्षेत्र में हज़ारों पेड़ों को काट देने का नतीजा है। इससे पहले भी वर्ष 2013 में ऋषिगंगा प्रोजेक्ट के उद्घाटन से दो दिन पहले जब यहां इस कार्यदायी कंपनी के मालिक अग्रवाल आए थे तब भी यहां भूस्खलन हुआ था। उस आपदा में कंपनी के मालिक की मौत हो गई थी और फिर यह प्रोजेक्ट बंद हो गया था। लेकिन पिछले साल इस परियोजना को एक दूसरी कंपनी ने अपने हाथ में ले लिया। लगातार ग्रामीणों की रोकटोक के बावजूद भी यहां काम चल रहा था। गाँववालों का सवाल है कि आखिर जिस जगह पर उन्हें चारापत्ती तक उठाने की इजाज़त नहीं वहां इतना बड़ा विद्युत् प्रोजेक्ट कैसे बना?

उत्तराखंड के चमोली जिले में रविवार के हादसे के बाद राहत और बचाव कार्य दूसरे दिन भी जारी रहा। फोटो- दीपक रावत/अरेंजमेंट

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