मैला ढोने वाले परिवारों का आरोप : 'काम छोड़ने के बदले में सरकार की तरफ से मिलने वाले 40,000 रुपए पर्याप्त नहीं'

हाथ से मैला उठाने वाले परिवार मैला उठाने का काम छोड़ दें, सरकार ने बदले में इनके जीवकोपार्जन के लिए चिन्हित परिवारों को 40,000 रुपए दिए हैं। यूपी के जालौन जिले में वर्षों से मैला साफ़ कर रहीं 500 से ज्यादा महिलाएं डेढ़ दो साल पहले ये काम छोड़ चुकी हैं। इनका आरोप है अगर सरकार ने इनपर ध्यान नहीं दिया तो फिर से मैला उठाने का काम शुरू करना इनकी मजबूरी होगी। गाँव कनेक्शन की विशेष सीरीज ''स्वच्छ भारत में मैला उठाती महिलाएं' के दूसरे भाग में पढ़िए उन महिलाओं के बारे में, जिन्होंने जीवन में पहली बार मैला उठाने का काम छोड़ा है ...

Neetu SinghNeetu Singh   19 Dec 2020 3:52 PM GMT

मैला ढोने वाले परिवारों का आरोप : काम छोड़ने के बदले में सरकार की तरफ से मिलने वाले 40,000 रुपए पर्याप्त नहींये हैं जालौन जिले के कदौरा ब्लॉक के चमारी गाँव की बड़ी बहु, जिन्होंने एक डेढ़ साल पहले मैला ढोने का काम छोड़ दिया है. फोटो : नीतू सिंह

जालौन (उत्तर प्रदेश )। डेढ़ दो साल पहले घर-घर जाकर हाथ से मैला उठाने वाली साठ-सत्तर वर्षीय बड़ी बहू आज दोपहर के डेढ़ दो बजे खेत से बकरियों के लिए हरी घास लेकर आयी थी।

सर से घास उतारकर हाथ में हंसिया लिए बड़ी बहू छप्पर के नीचे थुनकी (छप्पर को सहारा देने वाला डंडा) के सहारे बैठ गईं थी। थोड़ी देर सुस्ता कर बोलीं, "डेढ़ दो साल में इतना ही बदला है पहले इस समय गाँव से मैला साफ़ करके आते थे और आज खेत से बकरियों के लिए घास लेकर आये हैं।"

ये बताते हुए बड़ी बहू के चेहरे पर आत्मसंतुष्टि थी, "हम साठ-सत्तर साल के हो गये हैं, कम से कम 40-50 साल तो ये काम किया ही होगा। डेढ़ दो साल पहले जब ये 40,000 रुपए मिले तबसे गंदा काम (मैला उठाना) बंद कर दिया। बकरियां पाल ली हैं इन्ही की देखरेख करते हैं। अब ऐसा लगता है जैसे खोया हुआ सम्मान वापस मिल गया हो।"

बड़ी बहू (इनका नाम भी यही है) उत्तर प्रदेश के जालौन जिला मुख्यालय से लगभग 13 किलोमीटर दूर कदौरा ब्लॉक के चमारी गाँव की रहने वाली हैं। इनके गाँव में वाल्मीकि समुदाय के आठ घर हैं जिसमें बड़ी बहू समेत छह लोगों को ही सरकार की तरफ से मिलने वाली 40,000 रुपए की राशि मिली है। इन पैसों का कुछ महिलाओं ने कर्जा चुका दिया, कुछ ने बकरियां पाल लीं,किसी ने अपनी बेटी की शादी कर दी थी। इनका डेढ़ दो साल पहले 40,000 रुपए इन्ही कामों में खर्च हो गया था।

बड़ी बहू के तीन बेटे और एक बेटी हैं। ये बताते हुए बड़ी बहू खुश थीं, "सरकार के कहने पर हमने मैला उठाने का काम छोड़ दिया, बदले में हमें 40,000 रूपये भी मिले हम बहुत खुश थे। सोचा नहीं था कभी हम 40,000 रुपए इन आँखों से इस जीवन में देख पाएंगे।"

पीढ़ियों से मैला उठाने का काम बड़ी बहू की तरह वाल्मीकि समाज के परिवारों की हजारों महिलाएं मजबूरी में करती आ रही हैं। अगस्त 2019 में हुए एक सर्वे में उत्तर प्रदेश में 47 जिलों से 41,068 लोगों ने खुद को मैनुअल स्कैवेंजर्स बताते हुए रजिस्ट्रेशन कराया था जबकि राज्य सरकार ने केवल 19,712 लोगों को मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में स्वीकार किया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में अभी भी 19,000 से ज्यादा महिलाएं मैला उठाने का काम कर रही हैं।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अधीन काम करने वाली संस्था नेशनल सफाई कर्मचारी फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनएसकेएफडीसी) द्वारा 18 राज्यों के 170 जिलों में अगस्त 2019 में एक सर्वे कराया गया था. इन जिलों में कुल 87,913 लोगों ने खुद को मैला ढोने वाला बताते हुए रजिस्ट्रेशन कराया था। जिसमें सिर्फ 42,303 लोगों को ही राज्य सरकारों ने मैनुअल स्कैवेंजर्स (मैला ढोने वाले लोग) के रूप में स्वीकार किया गया। इस हिसाब से जितने लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया था, उसमें से 50 फीसदी से भी कम लोगों को मैनुअल स्कैवेंजर्स माना गया है।

सीरीज का पहला भाग यहाँ पढ़ें

घास लेकर आयीं अपने दरवाजे पर बैठीं बड़ी बहू, जो अब मैला नहीं उठाती हैं. फोटो : नीतू सिंह

बड़ी बहु की तरह सैकड़ों महिलाएं मैला उठाने का काम छोड़ने से खुश तो बहुत है लेकिन रोजमर्रा के खर्चों की जद्दोजहद भी इनके सामने है।

"हमें बहुत खुशी है कि जो गंदा काम (मैला उठाना) हमारी पीढ़ियों से चलता आ रहा है वो काम सरकार ने हमें मदद करके बंद करा दिया। लेकिन अभी खर्चे की बहुत दिक्कत है, इतनी महंगाई में बच्चों को पेटभर सब्जी-रोटी खिलाना बहुत मुश्किल हो रहा है। बहुत लोगों को तो डर है कि कहीं उन्हें मजबूरी में बच्चों का पेट भरने के लिए ये काम (मैला उठाना) फिर से न शुरू करना पड़ जाए," बड़ी बहू ने दोबारा से काम शुरू करने का अंदेशा जताया।

बड़ी बहु कहती हैं, "आप ही बताइये हम लोगों के पास कुछ भी नहीं है न जमीन न पैसा, क्या सरकार के 40,000 रुपए देने से हमारा काम चल जाएगा? हम नहीं कहते सरकार हमें नौकरी लगवाये पर मजदूरी का काम ही रोज मिलता रहे हम उसी में अपनी गुजर-बसर कर लेंगे।"

हाथ से मैला उठाने वाले परिवार मैला उठाने का काम छोड़ दें, सरकार ने बदले में इनके जीवकोपार्जन के लिए चिन्हित परिवारों को 40,000 रुपए दिए हैं। भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त विकास निगम के तहत जालौन जिले में अप्रैल 2018 में तीन कैम्प लगाये गए थे। जिसमें मैला ढोने वाले 649 लोगों को चिंहित किया गया था। अभी तक जीवकोपार्जन के लिए मिलने वाली 40,000 रूपये की राशि 546 लोगों को मिली है, बाकी लोगों को ये पैसा मिला या नहीं इसकी जानकारी किसी के पास नहीं है। बड़ी बहु की तरह जिले में वर्षों से मैला साफ़ कर रहीं 500 से ज्यादा महिलाएं डेढ़ दो साल पहले ये काम छोड़ चुकी हैं।

मैला उठाने का काम छोड़ने के बदले हर परिवार को 40,000 रुपए के अलावा इनके पुनर्वास के लिए इन्हें प्रति माह 3,000 रुपये के साथ दो साल तक कौशल विकास प्रशिक्षण देना था। इसी तरह एक निश्चित राशि तक के लोन पर मैला ढोने वालों के लिए सब्सिडी देने का भी प्रावधान है। लेकिन जिले में एक बार 40,000 रुपए देने के अलावा इनके पुनर्वास के लिए और कोई प्रयास नहीं किया गया।

उत्तर प्रदेश राज्यस्तरीय निगरानी समिति के सदस्य, जालौन जिले के भग्गू लाल वाल्मीकि बताते हैं, "जालौन जिले में 649 लोगों में से 546 लोगों के खाते में पैसा गया है बाकी कि हमें जानकारी नहीं है। अभी अक्टूबर में एक पत्र आया है जिसमें 162 लोगों के और नाम मांगे गये हैं जिन्हें 40,000 रुपए दिए जाएंगे। ये जो 40,000 रुपए इन परिवारों को मिले हैं ये काम छोड़ने के छह महीने तक के जीवकोपार्जन के लिए दिए गये थे ये राशि पुनर्वास के लिए नहीं हैं।"

ये हैं जालौन जिले की शोभारानी, जो आज भी हाथ से मैला साफ़ करने को मजबूर हैं. फोटो:नीतू सिंह

भग्गू लाल वाल्मीकि आगे कहते हैं, "जो कानून 2013 में लागू हुआ है उसके अनुसार यदि कोई परिवार मैला ढोने का काम करता है, सरकार उसे चिन्हित करती है तो वो तत्काल प्रभाव से मैला ढोने का काम छोड़ दे जिसके बदले में छह महीने तक के जीवकोपार्जन के लिए सरकार ने 40,000 रुपए देना निश्चित किया था। छह महीने के बाद इनके व्यवसाय के लिए दो लाख से 15 लाख तक लोन देने का प्रावधान था और एक व्यक्ति को रोजगार देना भी तय था लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। केवल इन्हें एक बार 40,000 रुपए दिए गये इसके बाद किसी ने इनकी सुध नहीं ली, अभी ये क्या काम कर रहे? इनके खर्चे कैसे चल रहे? इनकी क्या स्थिति है इसकी जानकारी किसी के पास नहीं होगी।"

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अधीन काम करने वाली संस्था नेशनल सफाई कर्मचारी फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनएसकेएफडीसी) ने 30 नवंबर 2020 को एक रिपोर्ट बनाई हैं जो अभी पूरी नहीं बनी है, अभी प्रोसेसिंग में है। इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2013 से लेकर 2018 तक देश के 17 राज्यों में कुल 57,396 मैनुअल स्कैवेंजर्स के जीवकोपार्जन के लिए 40,000 की राशि दी गयी है। ये राशि सबसे ज्यादा यूपी में 32,028 लोगों को दी गयी है। दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र 6261, तीसरे स्थान पर उत्तराखंड 4968, चौथे पर असम 3831 और पांचवे स्थान पर कर्नाटक है जहाँ 2890 लोग हैं।

आज भी वह बीते सालों को याद करते हुए बड़ी बहु भावुक हो गईं, "चारो बच्चों को गाँव वालों के टुकड़ों पर पाल-पोसकर बड़ा किया है। पढ़ाने के बारे में तब सोचते जब पेटभर इन्हें खाना मिलता। उस जमाने में पेट भरना ही बड़ी बात थी। कोई बासी (रात का भोजन) दे रहा, कोई चिड़ियों का खाया हुआ दे रहा, मजबूरी में सब बच्चे वही खाते थे। हम अपने बच्चों को कभी नये कपड़े नहीं पहना पाए, जो फटे-पुराने गाँव के लोग दे देते उसी से सबका तन ढकता था।"

आसपास बैठी कई महिलाओं ने बड़ी बहू की बातों का समर्थन किया। वहां बैठी सुनीता वाल्मीकि (45 वर्ष) कहती हैं, "अब आप चाहें सरकार का डर कह लो या फिर हमारी मजबूरी, पैसे मिलने के बाद हमने मैला ढोने का काम तो बंद कर दिया है लेकिन समस्याएं अभी भी ख़त्म नहीं हुई हैं। अभी दूसरों के यहाँ गोबर साफ़ करके आयी हूँ, महीने में जितने मन होता है दे देते हैं हम कुछ कहते नहीं हैं। रोज हमें मजदूरी करने को मिल जाए तब भी हमारा गुजारा हो जाएगा।"

देश में मैला ढोने की कुप्रथा पर पूर्णतया प्रतिबंध है। इसके लिए एक कानून भी बनाया गया है, "हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वासन अधिनियम 2013". इस कानून के तहत मैला ढोने के काम में संलिप्त लोगों को पुनर्वास किया जाए। जिला स्तर पर 'जिलास्तरीय सर्वेक्षण समिति' और राज्य स्तर पर 'राज्यस्तरीय सर्वेक्षण समिति' का गठन किया जाए। जो लोग भी इस काम में चिंतित पाए जाएं उन्हें रोजगार से जोड़ा जाए।

क्या कहता है कानून?

देश में पहली बार 1993 में मैला ढोने की प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बाद 2013 में कानून बनाकर इस कुप्रथा पर पूरी तरह से बैन लगाया गया था। कानून में प्रावधान है कि अगर कोई मैला ढोने का काम कराता है तो उसे सजा दी जाएगी, लेकिन केंद्र सरकार खुद ये स्वीकार करती है कि उन्हें इस संबंध में किसी को भी सजा दिए जाने की जानकारी नहीं है। मैला ढोने वालों का पुनर्वास सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए स्व-रोजगार योजना के तहत किया जाता है।

इस योजना के तहत मुख्य रूप से तीन तरीके से मैला ढोने वालों का पुनर्वास किया जाता है। पहला 'एक बार नकदी सहायता' के तहत मैला ढोने वाले परिवार के किसी एक व्यक्ति को एक मुश्त 40,000 रुपए दिए जाते हैं। मुआवजा राशि केवल जीवकोपार्जन के लिए दी जाती है इससे पुनर्वास नहीं होता है। मैला ढोने वालों को प्रशिक्षण देकर उन्हें रोजगार से जोड़कर पुनर्वास माना जाता है। इसके तहत प्रति माह 3,000 रुपये के साथ दो साल तक कौशल विकास प्रशिक्षण दिया जाता है। निश्चित राशि तक के लोन पर मैला ढोने वालों के लिए सब्सिडी देने का प्रावधान है।

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