"सुबह से रात तक कब्र खोदता हूं, लेकिन काम खत्म नहीं होता"

कब्र खोदने का काम करने वाले मुन्ना पिछले तीस साल से यह काम कर रहे हैं, लेकिन कोविड की दूसरी लहर में जितने शवों को उन्होंने दफनाया है पहले कभी नहीं किया था। कई बार तो उन्हें एक दिन में 10-10 कब्रें खोदनी पड़ीं। A day in the life of... सीरीज में एक और जिंदगी की कहानी

Mohit ShuklaMohit Shukla   20 May 2021 7:35 AM GMT

सीतापुर ( उत्तर प्रदेश)। बेहद गर्मी के बीच मुन्ना ने अपने जी तोड़ मेहनत के काम को रोका और नीम के पेड़ के नीचे कुछ देर सुस्ताने के लिए बैठ गया। उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में रहने वाले और कब्रिस्तान में कब्र खोदने का काम करने वाले मुन्ना ने गांव कनेक्शन से कहा, "काम कभी नहीं रुकता।"

"जब से कोरोना आया है, मैंने लगभग बिना सुस्ताए कब्र खोदी हैं। ऐसे कई दिन रहे, जब मैंने लगातार दस कब्रें तक खोदी हैं, " उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाया। "मैं उन मृतकों के रिश्तेदारों को मना नहीं कर सकता, जो मुझसे कब्र खोदने के लिए फरियाद करते हैं। सुबह से रात तक मैं इन दिनों यही कर रहा हूं और कितने दिन, पता नहीं।" 54 वर्षीय मुन्ना ने कहा।

सीतापुर जिले के एक कब्रिस्तान में कब्र को ढकते मुन्ना, ये इनका रोज का काम है। फोटो- मोहित शुक्ला

मुन्ना 30 साल से ज्यादा वक्त से उस कब्रिस्तान में कब्र की खुदाई का काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनसे पहले उनके परिवार की तीन पीढ़ियों तक यही काम किया था। वह कब्रिस्तान के करीब एक दरगाह के पास रहते हैं।

मैं तीस साल से कब्र खोद रहा हूं, लेकिन आज तक कभी इतनी ज्यादा संख्या में शवों को नहीं देखा। पूरे दिन कब्र खोदता हूं, उसके बाद भी यह सिलसिला रुकता नहीं है।- मुन्ना

सीतापुर जिले के तरीनपुर मोहल्ला में रहने वाले मुन्ना ने कहा, "मैं सुबह पांच बजे उठता हूं, नमाज अता करता हूं और भोजन के बाद काम पर निकल जाता हूं।" मुन्ना की एक बेटी कानून की पढ़ाई कर रही है और एक बेटे की राशन की दुकान है। सबसे छोटा नौ साल का बेटा अभी स्कूल में है।

मुन्ना ने गांव कनेक्शन को बताया, "मैं तीस साल से कब्र खोद रहा हूं, लेकिन आज तक कभी इतनी ज्यादा संख्या में शवों को नहीं देखा। पूरे दिन कब्र खोदता हूं, उसके बाद भी यह सिलसिला रुकता नहीं है।"

मुन्ना के मुताबिक, महामारी की दूसरी लहर से पहले वह रोजाना या हर दूसरे दिन सिर्फ एक या दो कब्र तैयार करते थे, लेकिन इन दिनों कोई गिनती नहीं है। उन्होंने कहा, "पहले मैं 200 से 500 रुपये से अधिक घर नहीं ले जा पाता था। अब दिनभर में कभी-कभी 2000 रुपये तक घर ले जाता हूं, लेकिन मैं थक जाता हूं।"

उन्होंने बताया कि जब खोदी हुई कब्र में शव को उतारा जाता है उसके बाद कब्र को ढंकना पड़ता है, जिसमें कम से कम आधा घंटा और लगता है। कोरोना की दूसरी लहर के बाद से कब्र खोदने वालों को इसके लिए दूसरे गांवों और कस्बों में भी जाना पड़ता है।

अपने परिवार के साथ मुन्ना।

गांव कनेक्शन ने मुन्ना से पूछा कि क्या उन्हें कोरोना पीड़ितों के इतने पास जाने में डर नहीं लगता, वो भी बिना पीपीई किट के ? इस पर मुन्ना मुस्कुराते हैं और कहते हैं, "हमें एक कब्र खोदने के लिए हजार रुपये मिलते हैं। आम तौर पर एक कब्र को पांच लोग खोदते हैं और हम उस पैसे को बांट लेते हैं। ऐसे में हम 600 रुपये तक की पीपीई किट नहीं खरीद सकते। हम अपने मास्क पहनते हैं और बाकी अल्लाह पर छोड़ देते हैं। हमारे परिवारों ने भी सब कुछ उन्हीं पर छोड़ रखा है, वो सब ठीक करेंगे।"

कई बार ऐसा हुआ हैं कि जब वह किसी गांव या कस्बे में कब्र खोदने गए तो उन्होंने पूरे दिन भूखे पेट काम करना पड़ा है। मुन्ना ने कहा, "लॉकडाउन के कारण ज्यादातर दुकानें बंद हैं। इसलिए हम खाने के लिए कुछ भी नहीं खरीद सकते हैं और हम उस घर से खाना नहीं मांग सकते, जहां किसी की मौत हुई हो। ऐसे में हम घर लौटने का इंतजार करते हैं और उसके बाद ही खाना खाते हैं।

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