सावित्री बाई फुले के जन्मदिन पर विशेष: कहानी तीन जिद्दी महिलाओं की, कोई वेश्यावृति के कलंक को मिटा रहा तो कोई आदिवासियों में शिक्षा की अलख जगा रहा

हर साल तीन जनवरी को आधुनिक भारत की पहली महिला शिक्षक सावित्री बाई फुले का जन्मदिन मनाया जाता है। उनके जन्मदिन पर हम आपके लिए लेकर मध्य प्रदेश की उन तीन महिलाओं की कहानी जो कहीं न कहीं सावित्री बाई फुल के नक्शे कदम पर चलने का प्रयास कर रही हैं।

Sunil Kumar GuptaSunil Kumar Gupta   3 Jan 2021 6:30 AM GMT

Savitribai Phule Birth Anniversary, Savitribai Phule Birth Anniversary Celebrating 190thतस्वीर बाये से- रोहिणी, हंसकला और कुमुद सिंह।

जिगर मुरादाबादी का मशहूर शेर है...

जो तूफानों में पलते जा रहे हैं,

वहीं दुनिया बदलते जा रहे हैं।

भोपाल (मध्य प्रदेश)। ये शेर उन महिलाओं के लिए बड़ा मौजू है, जो 190 साल पहले जन्मीं पूरे देश की महानायिका सावित्री बाई फुले के नक्शे-कदम पर, कहीं न कहीं, उनके अंश के रूप में महसूस करते हुए गांव-गांव, शहर-शहर में लड़कियों की बेहतर जिंदगी के लिए रास्ते आसान करने का काम कर रही हैं। हर साल तीन जनवरी को शिक्षक सावित्री बाई फुले का जन्मदिन मनाया जाता है।

"उसके पास बच्चियों को मत भेजो, वो उन्हें बेच देगी।" कुछ ऐसा ही तो कहा था लोगों ने, जब भोपाल की कुमुद सिंह ने 16 बरस पहले वंचित समुदाय की किशोरी बालिकाओं को उनकी बस्तियों, स्कूलों में जाकर, घर बुलाकर जीवन, रक्षा, शिक्षा और सम्मान का पाठ पढ़ाना शुरू किया था।

"जो खुद एक जिस्म का धंधा करने के लिए बदनाम जाति से जुड़ी है, वह क्या समाज के लिए कर पाएगी," कुछ ऐसा ही तो कहा था लोगों ने, जब मुरैना की रोहिणी छारी ने अपने उस बेड़िया समुदाय पर सदियों से लगे वेश्यावृति के कलंक को मिटाने और उस दलदल में फंसी बेटियों को मुक्त कराने की पहल की थी।

"अपनी ही जिंदगी में तमाम आरोप लेकर घूम रही औरत बेटियों, महिलाओं की जिंदगी क्या बदलेगी, इससे दूर ही रहो तो अच्छा है।" लोगों ने कुछ ऐसा ही तो कहा था सिवनी जिले की हंसकला से, जो अपने जीवन से सबक लेकर गांव-गांव जाकर बेटियों को शिक्षा लेकर आत्मनिर्भर बनने का सबक सिखाने निकल पड़ी थी। कुमुद सिंह हों या रोहिणी या फिर हंसकला, समाज से तानों, झिड़कियों, नसीहतों की शक्ल में बरसे आरोपों के पत्थरों को इन तीनों ने खूब झेला, लेकिन अपनी राह न छोड़ी।

क्या इन तीनों महिलाओं में आपको तमाम विरोध, गालियां, गोबर की मार और अत्याचार सहते हुए देश में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोलने वाली और पहली महिला शिक्षक, पहले किसान स्कूल की संस्थापक, गर्भ में ही कन्या शिशु को खत्म कर देने की मानसिकता के खिलाफ और धर्म-जाति, बिरादरी से ऊपर उठकर स्त्री-पुरुष समानता के लिए आवाज उठाने वाली हमारी पूर्वज सावित्री बाई फुले के अंश और उनकी विरासत को सहेजने, आगे बढ़ाने की निर्विकार कोशिशें नजर नहीं आतीं, जिनका आज जन्मदिवस मनाने जा रहे हैं।

शिक्षा की अखण्ड ज्योति जला गईं सावित्री बाई फुले

जी हां, हम बात कर रहे हैं 3 जनवरी 1831 में महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में जन्मी सावित्रीबाई फुले की, जिन्होंने 1840 में जीवनसाथी बने ज्योतिराव याने ज्योतिबा फुले के सानिध्य में रहकर न सिर्फ खुद पढ़ा, बल्कि घोर सामाजिक पाबंदियों के बीच भारी विरोध को सहते हुए बालिका, स्त्री और दलितों की शिक्षा की अखण्ड ज्योति जलाई जलाई थी। वह पुणे में 1848 में कन्या स्कूल खोलने वाली और टीचर्स-पैरेंट्स मीट शुरू करने वाली देश की पहली महिला थीं। बाद के समय में उन्होंने एक दो नहीं, बल्कि 17 ऐसे स्कूल खोले, जहां दलितों, बच्चों और बेटियों को न सिर्फ शिक्षा दी जाती थी, बल्कि पढ़ने की एवज में पैसे भी दिए जाते थे।

सावित्री बाई फुले और उनके पति ज्योतिराव फुले की प्रतिमा।

ये बिट्रिश शासित राज में चल रहे देश का वो दौर था, जो जात-पात, रूढ़िवादिता, छुआछूत, पाखंडों, लैंगिक भेदभाव और पितृसत्तात्मक मानसिकता से भरा हुआ था, जहां महिला अधिकार नहीं के बराबर थे। ऐसे दौर में सावित्री बाई फुले बाल, युवा विधवाओं के मुंडन के खिलाफ मुंबई में नाईयों की सबसे बड़ी हड़ताल कराने वाली देश की पहली महिला भी थीं।

जब परेशान होते हैं, तब याद कर लेते हैं सावित्री बाई को

भोपाल में लैंगिक समानता और बच्चों, महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों को लेकर सरकारी या गैर सरकारी फंडिंग का सहारा लिए बिना अपने सहयोगियों को साथ लेकर एक जुनून के साथ जुटी हुईं सामाजिक कार्यकर्ता कुमुद सिंह कहती हैं "आज इस क्षेत्र में थोड़ा बहुत काम करते हुए जब कोई परेशानी आती है, या झुंझलाहट होती है, तब याद कर लेते हैं अपनी अग्रज सावित्री बाई फुले को।" उन्होंने पढ़ा है कि जब सावित्री बाई लड़कियों को पढा़ने स्कूल जाती थीं, तब वे एक साड़ी अपने थैले में रख कर ले जाती थीं, क्योंकि समाज के स्वयंभू नेता, ठेकेदार जो लड़कियों को शिक्षित नहीं होने देना चाहते थे, वे सावित्री बाई पर कीचड़, गोबर, विष्ठा फेंक देते थे, लेकिन सावित्री बाई रुकती नहीं थीं। वे स्कूल पहुँच कर स्नान कर दूसरी साड़ी पहन लड़कियों को पढा़ती थीं।

रिश्तों की बात

एक बात और कि सावित्री बाई फुले को उनके जीवनसाथी ज्योतिराव फुले के बिना तो याद किया ही नहीं जा सकता। जीवनसाथी के रिश्ते को सही मायनो में समझना हो, तब भी इन्हें याद किया जाना चाहिए।... और सावित्री बाई और ज्योतिबा फुले को याद करते हुए हम फातिमा शेख और उनके भाई उस्मान शेख को भी नमन करते हैं। फातिमा शेख, जिन्होंने तमाम विरोध झेलते हुए, अपनी जान की परवाह किये बगैर कदम कदम पर सावित्री बाई का सहयोग किया और उस्मान शेख ने ज्योतिराव को पत्नी सहित घर निकाले जाने पर अपने घर में उनके रहने की व्यवस्था की थी।

रोगियों की सेवा करते हुए महाप्रयाण

10 मार्च 1897 को प्लेग के कारण सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया। प्लेग महामारी में सावित्रीबाई प्लेग के मरीज़ों की सेवा करती थीं। एक प्लेग के छूत से प्रभावित बच्चे की सेवा करने के कारण इनको भी छूत का यह रोग लग गया। और इसी कारण से उनकी मृत्यु हुई।

सावित्री बाई की राह पर चलीं कुमुद

सामाजिक कार्यकर्ता कुमुद सिंह वैसे तो भोपाल के एक कालेज में प्राणी विज्ञान की असिस्टेंट प्रोफेसर थीं, लेकिन समाज में लैंगिक भेदभाव और बेटियों, बच्चों, महिलाओं की स्थितियों को देख व्यथित होकर लोगों को जागरूक करने के मकसद से नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह से सामाजिक बदलाव के काम में जुट गईं।

सन् 2006 में सरोकार नामक समूह का गठन कर लिंग चयन आधारित गर्भपात के विरूद्ध अपनी चार साल की बेटी यशस्वी के साथ नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से अभियान की शुरूआत की। चौराहा हो, मेला हो या कहीं कोई उत्सव या कार्यक्रम, जहां भी भीड़ दिखती, वहीं लैंगिक भेदभाव के विरुद्ध लोगों को जगाने के लिए मां-बेटी का नाटक शुरू। सरोकार का तो सूत्र वाक्य ही है कि "कोख से संसार तक बचे बेटी, ससम्मान बचे बेटी।"

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नौकरी छोड़ने के बाद घर में भी आर्थिक दिक्कतें आईं, लेकिन इस काम में कभी उन्हें रोड़ा नहीं बनने दिया। कभी बस में जाते, कभी पैदल। कुमुद बताती हैं कि "पहले लोग कहते थे, पागल हैं क्या, यह सुनकर मुझे बुरा नहीं लगा। फिर किसी के कहे एक वाक्य से बड़ा हौसला मिला कि जब आप समाज की बेहतरी के लिए काम करते हैं, तो पहले लोग पागल कहते हैं, फिर उसके पागलपन को देखने लगते हैं, फिर पागल के काम पीछे चलते हुए उसका अनुसरण करने लगते हैं। इसके बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। लोग जुड़ते गए कारवां बनता गया।"

महिलाओं को जागरूक करती कुमुद सिंह।

बेहद गरीबी से जूझती, गंदगी से बजबजाती उन तंग बस्तियों में जाकर कर बेटियों की शिक्षा और बाल विवाह को रोकने के लिए अभियान चलाया, जहां कम उम्र में बेटियों को शादी के नाम पर गुजरात या राजस्थान, हरियाणा के लोगों को बेच दिया जाता था। उन बस्तियों की बच्चियों को टीम में शामिल कर उनसे नुक्कड़ नाटक कराए। घर में बुलाकर इन बच्चियों को मैं पढ़ाती भी थी, तो लोग बेटियों के माता-पिता से कहते थे, कि उनके घर अपनी बच्ची को मत भेजा करो, वरना किसी दिन बेच देंगे, तो पता भी नहीं चलेगा। कोई कहता बिना कमाई के कोई इस तरह के काम करता है क्या।

कुमुद कहती हैं कि मैंने बहुत सुना, सहा, लेकिन मेरे मन में एक ही बात थी कि मैं बेटियों को अशिक्षा, बाल विवाह के दलदल में खत्म होते नहीं देख सकती। वह बताती हैं कि नाटक के संवाद बोलते बोलते की लड़कियों ने घरों में अपने बाल विवाह रुकवाए। उनके बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ तक की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया। कई बार तो घर पुलिस छावनी जैसा बना रहता था, क्योंकि भोपाल की मदर इंडिया कालोनी, राहुल नगर, भीम नगर जैसी बस्तियों में लड़की खरीदने आए दलालों को पकड़ने की योजना और मिशन घर पर ही बनती संचालित होती थी। कुमुद कहती हैं कि नौकरी छोड़ने के बाद से आर्थिक संकट का सामना तो करना पड़ा, क्योंकि बीते 16 सालों में किसी सरकारी या गैर सरकारी फंडिंग का सहारा नहीं लिया। बस मित्रों की मदद से सारे अभियान चलते हैं।

संस्था ने वंचित समुदाय की कुछ बेटियों को गोद लिया, जिनकी शिक्षा का इंतजाम संस्था और उसके शुभचिंतकों ने किया। स्कूल के समय से साथ आईं इन बेटियों में से अब कोई नौकरी कर रही है, कोई एमबीए, इंजीनियरिंग कर चुकी हैं, कई अपना खुद का कारोबार करते हुए आत्मनिर्भर हो गई हैं, मेरा वो सपना साकार हो रहा है, जिसकी शुरुआत सावित्री बाई फुले ने 1848 में की थी। कुमुद बताती हैं कि लैंगिक समानता के प्रति जागरुकता के लिए युवाओं, शिक्षकों, सामाजिक, धार्मिक, लेखक, कवियों महिला समूहों, डाक्टर्स, वकील, धर्मगुरु आदि सभी को जोड़कर हर स्तर पर जारुकता के लिए लगातार संवाद करते हैं। मेरा मानना है कि धीरे-धीरे जब सब जागेंगे, तभी महिला हिंसा, भेदभाव जैसी बुराईयां हटेंगी। बच्चों के शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सहभागिता और सम्मान जैसे मुख्य अधिकारों को लेकर हर साल 60-60 दिन के शिविर लगाते हैं। इन दिनों में बच्चों के लिए रोज घर से नाश्ता बनाकर ले जाने में कुमुद को थकावट महसूस नहीं होती। साल भर के लिए कुछ बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा संस्था उठाती है। वह कहती हैं कि बच्चे ही तो भविष्य हैं, अगर यह स्वस्थ शिक्षित होंगे, तभी भावी पीढ़ियां भी बेहतर होंगी, तभी बेटियां भी समाज में सुरक्षित रह सकेंगी। यही तो सावित्री बाई फुले का सपना था। कुमुद कहती हैं प्रेरणा बनने के लिए आभार, जन्मदिन मुबारक सावित्री बाई फुले...।

रोहिणी की राह

जिस तरह सावित्री बाई फुले ने छुआछूत रोकने, विधवा विवाह कराने के साथ ही अनेक सामाजिक कलंक को मिटाने की कोशिश की, ठीक उनसे प्रेरित होकर एक कोशिश पिछले 13 सालों से मुरैना जिले की रोहणी छारी भी कर रही हैं। रोहिणी खुद बेड़िया समुदाय से हैं। ये समुदाय जो लोककलाओं से समृद्ध है, लेकिन जिसे पहले ब्रिटिश राज के दौरान 1871 में एक्ट बनाकर आपराधिक जनजातियों में से एक घोषित किया गया और देश की आजादी के बाद विमुक्त जनजाति का दर्जा दिए जाने के बाद उसपर बदनामी का यह सामाजिक कलंक लगा कि वह अपनी बहन-बेटियों से वेश्यावृति का पेशा कराता है और उसकी कमाई पर चलता है। बता दें कि बेड़िया समुदाय का प्रसिद्ध लोकनृत्य राई है, जो पूरे देश में बहुत प्रसिद्ध है। सागर, रतलाम, मंदसौर, नीमच, मुरैना आदि कई शहरों और गांवों में बेड़िया समुदाय के लाखों लोग रहते हैं।

रोहिणी कहती हैं कि जब आगरा में बेटी के रूप में जन्मी मैं 16 साल की उम्र में शादी के बाद बहू बनकर मुरैना आई, तब बेड़िया समाज के वास्तविक माहौल से रूबरू हुई. चौंकी, घबराई। मेरा समुदाय ऐसा है, जिसमें लड़कियां बहुत कम 16-17 बरस की उम्र में वेश्यावृति से जुड़ जाती है। यहां हम दो तरह का समाज देखते हैं। यह भी देखते हैं कि एक तो वो, जहां बेटी कमा कर लाती हैं। दूसरी वो जो बहू बनकर परिवार का ख्याल रखने के लिए लाई जाती है। दोनों ही चाहे वो बहु बनकर आई हो , चाहे वो प्रास्टीट्यूशन से जुड़ी बेटी हो, दोनों को ही बहुत बड़ा संघर्ष करना पड़ता है। उनकी अपनी कोई पसंद या निर्णय नहीं होता। समाज में परिवार के लोग तय करते हैं कि लड़की की शादी करना है, या उसे प्रास्टीट्यूशन में जाना है। ये तो 16 से 18 बरस की उम्र के बीच में ही तय हो जाता है।

रोहिणी कहती है कि समाज के नियम भी कठोर हैं, लड़की अगर प्रास्टीट्यूशन में है, तो वह शादी करके नहीं बैठ सकती। और एक अगर बहू बनकर आई है तो उसपर भी पाबंदियों का बहुत बड़ा घेरा है। वह दरवाजे पर खड़ी नहीं हो सकती, किसी से बात नहीं कर सकती। यह सब मैंने 3 साल देखा। 2005 में मैं प्रेग्नेंट हुई, मेरा तीसरा बच्चा था। मैंने इस माहौल के खिलाफ आवाज उठाई तो मेरे साथ भी शारीरिक हिंसा याने मारपीट भी हुई। घर से भी एक बार निकाल दिया गया और छोटे बच्चों को छीन लिया गया। उस माहौल में मैं नहीं ढल पा रही थी। परिवार में लड़कियों के साथ किस तरह का व्यवहार है, वह मैं देख नहीं पा रही थी, अंदर ही अंदर घुट रही थी। मानसिक रूप से बीमार जैसी हो गई थी, तब मैं ठाना कि चाहे कुछ हो जाए, मैं पहले पढूंगी, आत्मनिर्भर बनूंगी, अपने समाज की स्त्रियों की दशा बदलूंगी। मैं मायके नहीं गई। मैंने एमपी बोर्ड से 12वीं करने के बाद उत्तरप्रदेश से बीए किया। फिर 2007 में मुरैना में एचआईवी एड्स को लेकर एक प्रोजेक्ट कर रही धरती नामक संस्था में पियर एजुकेटर के रूप में जुड़ गई और अपने ही बेड़िया समुदाय के बीच 3 साल तक काम किया। मैंने 2010 में अपनी संस्था बनाई। नाम रखा भूमि ग्रामोत्थान एवं सहभागी ग्रामीण विकास समिति। यह समिति 21 गांवों में काम करती है। इन गांवों में बेड़िया समाज के लोग रहते हैं। मेरी प्राथमिकता थी, कि मैं अपने समाज के लिए ही काम करूं।

मुरैना में बेड़िया समुदाय की महिलाओं के लिए आयोजित जागरुकता कार्यक्रम।

रोहणी बताती हैं कि मुरैना, अंबाह और पोरसा के क्रमशः सुभाषनगर, तालिकापुरा, छत्रिकापुरा,विहार कालोनी, सड़क्कापुरा, गुरूद्वारा मोहल्ला, माता कालोनी, गोठ, रामपुर, सकसेड़ी, देहाती पुरा, बागड़ीपुरा, खुशहालपुरा चंदोखर, कालकापुरा समेत कुल 21 गांव में बेड़िया समुदाय के 25 से 30 हजार लोग रहते हैं, इनमें से करीब 10 से 12 हजार लड़कियां, महिलाएं वेश्यावृत्ति के पेश से जुड़ी हैं। मैंने इन्हीं गांवों में काम किया। इसी दौरान कुछ विभिन्न संस्थाओं के साथ और फिर स्वतंत्र रूप से इन गांवों में लड़कियों को चिन्हित किया। 10-12वीं में पढ़ने वाली समुदाय की बेटियों के सपनों को जाना। मैं इस पक्ष में रही कि बेड़िया समाज में बेटी को निर्णय का वो अधिकार मिले कि वह समाज के नाम के साथ जुड़े पेशे के साथ जाए अथवा न जाए। उन्हें पूरी शिक्षा मिले। काम करते-करते दो दर्जन से ज्यादा बेटियों को सामाजिक पेशे को मानने से इंकार करने के लिए तैयार किया और फिर लड़कियों ने समाज के सामने अपने फैसले का एलान कर दिया कि वह वेश्यावृति का पेशा नहीं अपनाएंगी। ये मेरे लिए तो बड़ी सफलता थी, लेकिन एक बम फूटने जैसा भी था। लोग लड़ने लगे, अभद्र भाषा में कहने लगे कि आप हमारी बेटियों को समाज की संस्कृति से अलग कर रहे हो, परिवार तोड़ रहे हो। मैंने यह सब सुना, लेकिन डरी नहीं।

वे बताती हैं कि एचआईवी को लेकर काम के दौरान मैं कई औरतों से बहुत जुड़ गई थी। औरतों से यह सुनने में बड़ा अजीब लगा कि एक लड़की जो अपनी पूरी जिंदगी लगा कर कमा कर परिवार को देती है, अपने लिए कोई बचत नहीं करती। 40 की उम्र तक उसका शरीर धंधे के लायक नहीं रहता, तो उसे घर की जवान होती लड़कियों को अपने नए काम के बारे में समझाने, बुझाने, देखरेख के काम में लगा दिया जाता है। यह लड़कियां दिल्ली, मुंबई, नागपुर कोलकाता में सेक्स वर्कर के रूप में काम करती है।

रोहिणी कहती है कि काम के दौरान लोग ताने मारते थे कि यह क्या बदलाव करेगी, यह तो खुद उसी समाज की है, वैसी ही है, इनका समाज कभी नहीं सुधरने वाला। यह संस्कृति और परंपरा से अलग जाएगी क्या? लेकिन मैंने किसी की नहीं सुनी, मानसिकता परिवर्तन का काम जारी रखा जो आज भी जारी है। इन सबके पीछे कहीं न कहीं सावित्री बाई फुले जैसी महान विभूतियों की ही प्रेरणा और स्वयं के भीतर का उद्वेलन है।

हंसकला ने ठाना, बेटियां पढ़ें, आत्मनिर्भर बनें

मप्र के सिवनी जिले के कुरई ब्लाक के ग्राम दरासी कलां में रहने वाली और कक्षा 8वीं तक पढ़ी हंसकला गढ़पाल पेशे से तो आशा कार्यकर्ता हैं, लेकिन अपनी जिंदगी को किशोरी बालिकाओं की शिक्षा, उन्हें और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के काम में लगा दिया है। हंसकला का निजी जीवन बेहद गरीबी और दुश्वारियों में बीता। मां आंगनबाड़ी में सहायिका थीं। बहन मानसिक रूप से दिव्यांग। औपचारिकेत्तर शिक्षा से 5 वीं फिर जैसे तैसे स्कूल में 8 वीं कक्षा तक ही पहुंच सकीं। गरीबी इतनी कि पढ़ने के लिए किताबें तक नसीब नहीं होती थीं, सो पढ़ाई छूट गई।

एक साल के अंतराल के बाद 15 साल की उम्र में शादी कर हो गई, लेकिन साल भर ससुराल में हिंसा की शिकार हो कर घर लाकर छोड़ दी गई। कम उम्र में किसी पर विश्वास से मिले एक धोखे से हंस का जीवन नर्क हो गया था। वो गर्भवती हुई, तो ऐसा करने वाला छोड़ भाग गया। थाना-कचहरी होने लगी, तो वह जीवन का अंत करने के बारे में सोचने लगी। लोग भी बहुत भला-बुरा कह रहे थे, तभी फरिश्ता बनकर थाने में मिले एक इंस्पेक्टर के एक वाक्य ने हंस की जिंदगी बदल दी, इंसपेक्टर ने कहा " दाग तो चांद में भी होता है, लेकिन फिर भी वो निकलता है न, खूबसूरत लगता है न। फिर तो हम इंसान हैं, सारी बातें भूलकर अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाना है।"

मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में आदिवासी महिलाओं के बीच हंसकला।

हंसकला कहती हैं कि 2005 में बेटे के जन्म के बाद उसी दिन से सब चीजें भूल गई हूं। गांव में बहुत सारी दिक्कतें हुईं। लोग मुझसे बात नहीं करते थे, निकलती थी तो हिकारत से देखते थे। 2006 में मुझे आशा कार्यकर्ता का काम मिला है, मुझे ट्रेनिंग में बताया गया था कि पहले दरवाजे से आखिरी चूल्हा तक जाना है, अब वो रास्ता तुम कैसे तय करोगी, ये तुम्हारे ऊपर है। अपने काम में मजबूती हासिल करने के साथ ही मैंने किशोरी बालिकाओं की जिंदगी को सुधारने, उन्हें शिक्षा के लिए प्रेरित करने के बारे में संकल्प किया। तब सिवनी के नवेन्दु भैया, गौरव जायसवाल, महेन्द्र डहरवाल नामक सामाजिक कार्यकर्ताओं से संपर्क हुआ। चंडीगढ़ से मैंने फेसिलिटेटर की ट्रेनिंग ली और किशोरी मित्र के रूप में महिला सशक्तीकरण के लिए काम करते हुए उदयपुर में मुझे फैलोशिप भी मिली।

हंसकला बताती हैं कि भोपाल में ट्रेनिंग लेकर जेंडर विषय में मास्टर ट्रेनर बनी। इसके बाद आजीविका मिशन से जुड़ गई। अब गांव-गांव जाकर किशोरियों और महिलाओं के स्व-सहायता समूह बनाती हूं और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का काम करती हूं। स्कूल हों या स्वसहायता समूह, मैं किशोरियों को विपरीत लिंगी से आकर्षण को लेकर जागरूक व सचेत करती हूं, ताकि उनकी जिंदगी में कोई भटकाव न आए। पहले वो ठीक से पढ़ें और आत्मनिर्भर बनें, फिर इसके बाद अपनी जिंदगी के सही-गलत फैसले करें। मेरी जिंदगी तो जहर हो गई है. ये जहर मैं अभी भी पी रही हूं, लेकिन अब कोई और न भटके, यही कोशिश है मेरी। यही मेरी जिंदगी का मकसद है, मिशन है। कई साल की मेहनत के बाद मैनें अपना खोया सम्मान पाया है, वरना लोग कहते थे कि "अपनी ही जिंदगी में तमाम आरोप लेकर घूम रही औरत बेटियों, महिलाओं की जिंदगी क्या बदलेगी, इससे दूर ही रहो तो अच्छा है।" लेकिन अब सब बदल गया है, बदल रहा है।

कुमुद, रोहिणी. हंसकला जैसी अनेक महिलाएं हैं, जिनके जीवन में सावित्री बाई फुले के अंश मौजूद हैं, जो बेटियों को बेहतरी के लिए प्रेरित कर रहीं हैं, समाज बदल रही हैं। यह सफर जारी रहे...आमीन, धन्यवाद सावित्री बाई फुले ज्योति क्रांति प्रज्जवलित करने के लिए... जन्मदिन मुबारक।

साहिर लुधियानवी की लिखी चंद लाइनें हैं..

हजार बर्क गिरें, आंधियां उट्ठे,

वो फूल खिल के रहेंगे, जो खिलने वाले हैं।

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