लखीमपुर खीरी केस में समझौता, किसान आंदोलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई को लेकर संयुक्त किसान मोर्चा ने क्या कहा?

संयुक्त किसान मोर्चा ने लखीमपुर हिंसा में हुए प्रशासन के साथ हुए समझौते, राजनैतिक दलों के नेताओं को रोके जाने, सुप्रीम कोर्ट में किसान आंदोलन को लेकर सुनवाई, कृषि कानूनों आदि को लेकर अपनी प्रतिक्रिया जारी की है।

लखीमपुर खीरी केस में समझौता, किसान आंदोलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई को लेकर संयुक्त किसान मोर्चा ने क्या कहा?

संयुक्त किसान मोर्चा का बयान।

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में किसानों के नरसंहार के बाद, भाजपा नेताओं के हिंसा फैलाने और उकसावे पूर्ण बयानों के खिलाफ किसान संगठनों और नागरिकों ने सभी जिलाधिकारी कार्यालयों पर प्रदर्शन किया और राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा। लखीमपुर खीरी की घटनाओं में एक स्वतंत्र पत्रकार की भी मृत्यु हो गई है। एसकेएम ने सभी नागरिकों से शांति और व्यवस्था बनाए रखने की अपील की।

संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा कि लखीमपुर के तिकुनियां में विरोध कर रहे किसानों और प्रशासन के बीच समझौता हो गया है। एसकेएम नेताओं के साथ स्थानीय प्रदर्शनकारी किसानों और मृतक के परिवारों, और यूपी सरकार के प्रशासन के बीच एक समझौता हुआ, मारे गए किसानों के परिवारों को सरकार 45-45 लाख रुपये और एक-एक सरकारी नौकरी दी जाएगी। घायलों को 10-10 लाख रुपये दिए जाएंगे। केंद्रीय मंत्री आशीष मिश्रा टेनी और 15 अन्य के खिलाफ धारा 302, 120 बी और अन्य आरोपों के तहत प्राथमिंकी दर्ज की गई है, और सरकार ने कहा कि वह एक सप्ताह के भीतर सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर लेगी।

संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा कि केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी के खिलाफ भी 120बी जैसी धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। सरकार उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की देखरेख में मामले की जांच के लिए भी सहमत हो गई है। अजय मिश्रा टेनी को केंद्र सरकार से बर्खास्त करने की मांग निश्चित रूप से लंबित है।

गांव कनेक्शन से बात करते हुए संयुक्त किसान मोर्चा की तरफ से पहुंचे भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा था, "सरकार से 4 प्रमुख मांगों पर सहमति बन गई है। अगर एफआईआर दर्ज हुई है तो दोषियों की गिरफ्तारी भी होगी।"

इससे पहले प्रदर्शनकारी किसानों ने एक-एक करोड़ रुपए का मुआवजा, सरकारी नौकरी और केंद्रीय मंत्री की बर्खास्तगी और मंत्री के आरोपी बेटे की गिरफ्तारी की मांग की थी।

समझौते के बाद यूपी के एडीजी प्रशांत कुमार ने गांव कनेक्शन को बताया था कि किसानों की सभी मांगे मान ली गई है।

समझौते के ऐलान के बाद तिकनिया में अग्रेसन इंटर कॉलेज के खेल मैदान के बाहर सड़क पर रखे चारों किसानों के शवों को पोस्ट मार्टम और अंतिम संस्कार के लिए भेज दिया गया था।

इससे पहले चारों शव 3 अक्टूबर की शाम से लेकर 4 अक्टूबर की दोपहर तक मौके पर ही रखे रखे थे।

संयुक्त किसान मोर्चा ने अपने बयान में कहा कि, "चश्मदीद गवाह बताते हैं कि कैसे यह जानलेवा हमला पूर्व नियोजित लगता है, जिसे यूपी पुलिस द्वारा सुनियोजित तौर पर क्रियान्वित किया गया था। यह बताया जा रहा है कि प्रदर्शनकारियों को अंधाधुंध तरीके से कुचलने के लिए पुलिस ने मंत्री के बेटे, जो खुद थार वाहन चला रहे थे, के वाहनों को अनुमति देने के लिए बैरिकेड हटा दिए। चश्मदीद गवाह एसकेएम नेता तजिंदर सिंह विर्क को विशेष रुप निशाना बनाने के बारे बताते हैं।"

3 अक्टूबर की रात राकेश टिकैत, धर्मेंद्र मलिक समेत कई कई किसान नेता गाजीपुर बॉर्डर से लखीमपुर के तिकुनिया पहुंचे थे। जहां किसान संगठनों ने प्रशासन से तड़के वार्ता में अपनी मांगे बताई थी और सभी तहसीलों पर सुबह 10 बजे से 1 बजे तक प्रदर्शन करने औऱ राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौपने का ऐलान किया था। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा, बिहार, झारखंड, राजस्थान, कर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ में प्रदर्शन किए गए। दिल्ली हरियाणा के सिंघू मोर्चा पर भी मौन विरोध मार्च निकाला गया।

प्रदर्शकारी किसानों ने केंद्रीय गृह राज्य मंत्री को तत्काल बर्खास्त करने, मंत्री के बेटे और उसके साथियों की तत्काल गिरफ्तारी, सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा न्यायाधीश द्वारा जांच की मांग की थी। इसके अलावा किसान प्रदर्शकारियों ने हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के भी इस्तीफे की मांग की थी। खट्टर पर आरोप है कि उन्होंने आम लोगों से लठ्ठ उठाने की बात कर सबक सिखाने जैसा बयान दिया है।

लखीमपुर घटना को लेकर एसकेएम ने कहा कि संयुक्त किसान मोर्चा सभी नागरिकों से शांति और अहिंसा बनाए रखने की अपील की है, जैसा कि किसानों के संघर्ष का इतिहास रहा है। संयुक्त किसान मोर्चा ने प्रदर्शनकारियों से कहा कि वे हिंसा और सांप्रदायिक राजनीति द्वारा आंदोलन को पटरी से उतारने के भाजपा द्वारा बिछाए जा रहे जाल में न फंसें।

संयुक्त किसान मोर्चा ने धारा 144 लगाने, इंटरनेट सेवा बंद करने के साथ ही राजनैतिक दलों को रोके जाने की, हिरासत में लिए जाने की निंदा की है। गौरतलब है कि लखीमपुर जाने का ऐलान करने वाले सपा प्रमुख अखिलेश यादव, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी, बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा, आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह को हाउस अरेस्ट या हिरासत में लिया गया। यूपी सरकार ने कुछ लोगों को विशेष हवाई अड्डों से आने और जाने से रोक दिया, और पंजाब सरकार को भी लिखा कि पंजाब के किसी भी व्यक्ति को लखीमपुर खीरी में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी जाए। गुरनाम सिंह चढूनी और बूटा सिंह बुर्जगिल जैसे एसकेएम नेताओं को यूपी पुलिस द्वारा लखीमपुर खीरी पहुंचने से रोका गया है।

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ संयुक्त मोर्चा कभी सुप्रीम कोर्ट या किसी कोर्ट नहीं गया: SKM

संयुक्त किसान मोर्चा ने अपने बयान में कहा कि एसकेएम एक बार फिर स्पष्ट करता है कि उसने किसानों के आंदोलन के मुख्य मुद्दों - 3 किसान विरोधी केंद्रीय कानूनों या एमएसपी वैधानिक गारंटी - के समाधान के लिए कभी भी सर्वोच्च न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय का दरवाजा नहीं खटखटाया है।"

बयान में कहा गया है कि एसकेएम का हमेशा से मानना रहा है कि केंद्र सरकार द्वारा अपनाए गए किसान-विरोधी नीति निर्देशों को दर्शाने वाले तीन केंद्रीय कानूनों को केंद्र सरकार द्वारा ही निरस्त किया जा सकता है। इस दिशा में संयुक्त किसान मोर्चा ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर बातचीत फिर से शुरू करने की मांग की है।

एसकेएम ने संवैधानिकता के मामले पर भी अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया - जबकि यह महत्वपूर्ण है कि कृषि पर राज्य सरकार के संवैधानिक अधिकार को बहाल और मजबूत किया जाए, यह महसूस करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि कृषि कानूनों के मुद्दे केवल संवैधानिकता या उसके अभाव के बारे में नहीं हैं, यह किसानों पर कृषि कानूनों के प्रभाव और उनकी आजीविका हमले के बारे में भी है। हालांकि कानूनों को अभी के लिए स्थगित कर दिया गया है, एसकेएम जानता है कि इस स्थगन को किसी भी दिन हटाया जा सकता है। इसलिए, आंदोलन ने कानूनों के पूर्ण निरसन (निरस्त किये जाने) पर जोर दिया है।

जंतर-मंतर पर भी किसान संसद के आयोजन की बात आई तो एसकेएम ने अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया और इसके आयोजन के लिए दिल्ली पुलिस की अनुमति और सहयोग की शर्तों को पूरी तरह से पूरा किया। इसलिए, किसानों के आंदोलन का न्यायालयों में प्रवेश करने और न्याय की मांग करने और एक ही समय में विरोध करने का कोई सवाल ही नहीं है।

संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा, रोड जाम आदि मामले में याचिकाकर्ता का एसकेएम से कोई लेना-देना नहीं है। हाईवे जाम करने के मामले में खबर है कि सुप्रीम कोर्ट ने 43 नेताओं को नोटिस जारी किया है। संयुक्त किसान मोर्चा ने हमेशा कहा है कि किसानों ने सड़कों पर कोई बैरिकेडिंग या नाकेबंदी नहीं की है। हरियाणा, यूपी और दिल्ली पुलिस ने ऐसा किया है।"

राजमार्गों पर बैरिकेडिंग के कारण यदि कोई सार्वजनिक असुविधा हो रही है तो वह पुलिस के कारण है। किसानों ने यह भी कहा है कि यदि केंद्र सरकार अड़ियल और अनुचित तरीके से व्यवहार नहीं करती है, तो समाधान निकाला जा सकता है।

संयुक्त किसान मोर्चा ने पीएम मोदी को याद दिलाई उनकी पुरानी बातें

2011 में मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे और एक कार्यकारी समूह के अध्यक्ष थे तब उन्होंने भारत सरकार के "उपभोक्ता मामलों पर कार्य समूह की रिपोर्ट" में सिफारिश की थी कि एमएसपी प्रवर्तन को वैधानिक प्रावधानों के माध्यम से अनिवार्य किया जाना चाहिए। इसके अलावा, इससे पहले, 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में "दीर्घकालिक अनाज नीति पर उच्च स्तरीय समिति" की एक रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि सीएसीपी को उत्पादन की सी2 लागत के आधार पर तय किया जाना चाहिए। कमिटी ने यह भी सिफारिश की कि एमएसपी को वैधानिक दर्जा मिलना चाहिए। इस समिति को तत्कालीन भाजपा सरकार द्वारा दीर्घकालिक अनाज नीति के लिए सिद्धांत और दिशानिर्देश निर्धारित करने के लिए कहा गया था।

यह भी सर्वविदित है कि नरेंद्र मोदी और भाजपा ने किसानों के लिए सुधार का वायदा करते हुए 2014 में एमएसपी के मुद्दे पर पार्टी के चुनाव अभियान के लिए प्रचार किया था। 2018 में, मोदी सरकार ने संसद के पटल पर एक प्रतिबद्धता की कि एमएसपी को सभी किसानों के लिए एक वास्तविकता बनाया जाएगा। इसमें से कोई भी अमल में नहीं आया। अब समय आ गया है कि भाजपा किसानों से वायदे करने और फिर उनसे मुकरने की अपनी राजनीतिक बेईमानी पर गौर करे। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्तमान आंदोलन में किसानों की मांगों को पूरा करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ऐसा नहीं करने के निहितार्थ देश के लाखों अन्नदाता के जीवन और मृत्यु से जुड़ा है।

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