जमक्कालम: जीआई टैग मिलने के बाद भी 200 साल पुरानी हस्तकला खत्म होने की कगार पर

हस्तकला जमक्कालम को वर्ष 2005-2006 में जीआई टैग तो मिल गया, लेकिन उससे इसकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। पावरलूम ने बुनकरों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। सदियों पुरानी हस्तकला खत्म होने की कगार पर है।

Pankaja SrinivasanPankaja Srinivasan   3 March 2021 1:15 PM GMT

Hanging By a Thread: The 200-year-old craft of weaving handloom carpets, called jamakkalams, faces extinction in Tamil Naduपावरलूम की बढ़ती संख्या ने इस हस्तकला को खत्म होने की कगार पर पहुंचा दिया है। (फोटो- सी सर्वानन)

यह लगभग दोपहर के खाने का वक्त था। रसम की महक चारों ओर फैल चुकी थी, अब उस पर सरसों के बीज के छींटे मारे जा रहे है। शायद यही वजह थी कि के वडिवेल और एम सेल्वाराज खुशी से मुस्कुरा रहे थे। दो नंगे बदन वाले लोग जो बचपन के दोस्त हैं और जिनकी उम्र 65 और 63 वर्ष है, कीचड़ से सने आंगन में बैठे हैं और उनके पैर जमीन में चारों ओर से मजबूती से गड़े लकड़ी के लूम (करघा) के गड्ढे तक पहुंच रहे हैं जिस पर वे काम कर रहे हैं।

वे एक लगभग 14 फीट की चौड़ाई वाले लूम पर जमक्कालम (कॉटन का मजबूत कालीन) की बुनाई कर रहे है। कारपेट पर हिंदी में इसके भविष्य के होने वाले मालिक का नाम लिखा जा रहा है। वडिवेल मालिक के सामने एक ऊभरे हुए पीले कागज पर बड़ी सावधानी से देवनागरी लिपि में नाम 'सुखदेव मानिक' और जन्मदिन का विवरण लिख रहे हैं।

"हम हिंदी को छोड़कर कोई दूसरी भाषा न तो पढ़ना जानते हैं और न ही लिखना," यह कहकर वडिवेल बिना रुके हंसे लगते हैं। वे अपने पैरों को सेल्वाराज के पैरों के साथ कभी ऊपर तो कभी नीचे ले जा रहे हैं। उनके हाथ समय-समय पर कपड़े के शटल को दूर ले जा रहे हैं, उनमें से एक लूम पर इधर-उधर फैले कपड़े के खिंचाव को ठीक कर रहा है। लूम के चलित पुर्जों में तेल देने के लिए सूत के साथ-साथ तेल की सीसी भी टंगी है।

हथकरघे पर बैठे के वडिवेल और एम सेल्वाराज। (फोटो- पंकजा श्रीनिवासन)

जैसे-जैसे वे काम कर रहे हैं, नारंगी चटाई पर आहिस्ता-आहिस्ता नाम ऊभर रहा है। शब्द कागज के टुकड़े पर लिखे नाम के हुबहू नकल लग रहे हैं। राज्य की राजधानी केरल से लगभग 400 किलोमीटर दूर जिला इरोडा, ब्लॉक भवानी के पेरिया मोलापलायम के बुनकरों में ये कला पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।

भवानी, कावेरी, भवानी और अदृश्य अमृता नदी के संगम के पास स्थिति है। यहां के कलरफुल जमक्कालम को 2005 में भौगोलिक संकेत (GI) टैग मिला था, जो इस क्षेत्र में लगभग 200 वर्षों से बुना जा रहा है, लेकिन यह हस्तकला धीमी मौत मर रही है।

लगभग पांच वर्ष पहले पेरिया मोलापलायम गांव में लगभग 120 बुनकर और 40 लूम्स थे। अब मुश्किल से 60 बुनकर और 25 लूम बचे हैं। ज्यादातक बुनकरों की उम्र 50 साल के ऊपर है।

तब जब हर कोई खरीदता था जमक्कलम

एक समय था जब जमक्कालम अमीर हो या गरीब, सबके जीवन का हिस्सा होता था। वे खासकर शादी विवाह के लिए इसके लिए ऑर्डर देते थे और इस पर दूल्हा-दुल्हन के नाम लिखे जाते थे।

त्योहारों के सीजन में मेहमानों को ज्यादा जगह देने के लिए भी इसकी खरीदारी होती थी। शादी की दावतों में लोग इस पर बैठकर केले के पत्ते पर खाना खाते थे। शादी के सभी कार्यक्रमों में शुभ सामान जैसे मिठाइयां, फल और फूलों की व्यवस्था बड़े प्यार से जमक्कलम पर की जाती थी। धारीदार कपास की चटाई पातू की कक्षाओं (म्यूजिक क्लास) में भी वितरित की जाती थीं जिस पर वे दोपहर बाद थोड़ा आराम करते थे।

कलरफुल जमक्कलम। (फोटो- पंकजा श्रीनिवासन)

लेकिन अब जमक्कालम पर न तो कोई बैठता है और न ही सोता है। पेरिया मोलापलायम के बुनकर राजू निराश होते हुए कहते हैं। "एक समय था जब एक सप्ताह में 1,000 से ज्यादा जमक्कलम बाहर जाता था, वह भी केवल हमारे गांव से, और अब अगर एक महीने में 100 भी चला जाये तो हम खुद को भाग्यशाली समझते हैं।" वे गांव कनेक्शन से कहते हैं।

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ओडिशा, कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में भवानी जमक्कालम का बड़ा बाजार था। यह अब भी कुछ खाड़ी देशों में जाता है जहां लोग प्रार्थना करते समय इसका उपयोग करते हैं।

"हम अपना जमक्कालम इन राज्यों में ट्रक, ट्रेन और यहां तक कि पोस्ट से भी भेजते थे, लेकिन पॉवर लूम (बिजली से चलने वाले करघा) के सस्ते विकल्पों की वजह से यह सब कम हो गया।" शक्तिवेल कहते हैं।

बुनकर एक दिन में औसतन 250 से 350 रुपए का रुपए की कमाई कर सकते हैं, लेकिन यह निर्भर करता है कि वे कितना जमक्कलम बुन पाते हैं

वर्ष 2000 में पॉवरलूम आने के बाद ही हैंडलूम (हाथ से चलने वाले करघा) जमक्कालम के पतन का आभास होने लगा था। दी हैंडलूम्स (उत्पादनार्थ वस्तु आरक्षण) अधिनियम, 1985 पॉवरलूम को ऐसे उत्पादों का उत्पादन करने से रोकता है जो हथकरघा के लिए आरक्षित हैं।

भवानी जमक्कालम भी उनमे से एक है। फिर भी पॉवरलूम्स दंड मुक्ति के साथ काम रहे हैं और अधिक से अधिक हथकरघा बुनकर कारखानों में काम करने के लिए जा रहे हैं। यहां तक कि घरेलू काम और रसोइयों के रूप में काम कर रहे हैं। इसका परिणाम यह हो रहा कि उनकी पारंपरिक कला का भविष्य दिन पर दिन धूमिल हो रही है। बुनकर यह भी शिकायत करते हैं कि सूत पर लगने वाले जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) का भुगतान उनकी परेशानी और बढ़ा रहा है।

जमक्कलम कई पीढ़ियों तक आय का मुख्य स्त्रोत रहा है। (फोटो- पंकजा श्रीनिवासन)

"हम हमारी आमदनी में सेंध लगा रहे पॉवरलूम का मुकाबला नहीं कर सकते," राजू कहते हैं। एक बुनकर हथकरघा से जितना जमक्कालम दिनभर में बुनता है, पॉवरलूम्स उससे तीन से चार गुना ज्यादा बुनाई करता है।

"जहां हथकरघा से एक स्क्वायर फीट के जमक्कलम में 25 रुपए का खर्च आता है, वहीं पॉवरलूम में यही खर्च 15 रुपए प्रति स्क्वायर फीट आता है। और कुछ लोग यह अंतर बता सकते हैं। ऐसे में लोग हथकरघा के जमक्कालम के लिए ज्यादा पैसे क्यों देंगे," राजू पूछते हैं।

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"जमक्कालम अभी भी सांस ले रहा है, लेकिन मुश्किल से," हथकरघा और वस्त्र उद्योग विभाग इरोड, के एक अधिकारी ने गाँव कनेक्शन को बताया। उन्होंने स्वीकार किया कि शायद हम भवानी में हथकरघा बुनकरों की आखिरी पीढ़ी देख रहे हैं। "सरकार प्रशिक्षण और आर्थिक प्रोत्साहन जैसी कई योजनाएं चला रही है। यही एकमात्र कारण है कि यह हस्तकला अभी भी जीवित है, अन्यथा यह बहुत पहले गायब हो जाता। हालांकि, यह मदद हथकरघा जमक्कालम को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं है क्योंकि बुनकरों के लिए मजदूरी दर अपर्याप्त है।" उन्होंने कहा।

हथकरघा और वस्त्र विभाग, इरोड के आंकड़ों के अनुसार, 2015-16 में भवानी में 3,654 हथकरघा और 8,231 बुनकर थे। 2020-21 में 3243 करघे पर 7368 बुनकर अभी भी काम कर रहे हैं। इस क्षेत्र में 323 पावरलूम भी चल रहे हैं।

एक दिन के लिए 126 रुपए

पेरिया मोलापलायम गांव के पी शक्तिवेल जब 14 साल के थे तब से जमक्कालम की बुनाई कर रहे हैं। 64 वर्षीय शक्तिवेल बुनकरों के बीच अपनी हस्तकला में नये आइडिया को अपनाने और बेहतरीन काम के लिए जाने जाते हैं। इस विलुप्त होती हस्तकला को फिर से वापस लाने में मदद के लिए हाल ही में उनसे कुमारगुरु संस्थान (पश्चिमी तमिलनाडु में इनके अंडर में कई कॉलेज हैं) ने संपर्क किया।

2015-16 में भवानी में 3,654 हथकरघा और 8,231 बुनकर थे। 2020-21 में 3243 करघे पर 7368 बुनकर अभी भी काम कर रहे हैं

"सेल्वराज, वडिवेल और मेरे जैसे लोग अब कुछ ही बचे हैं।" शक्तिवेल गांव कनेक्शन से कहते हैं। "आप जो पुरुष और महिला को बुनते देख रहे हैं, बुनकरों में शायद ये आखिर होंगे। अगर हमें और हमारी हस्तकला को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाये गये तो हमारे साथ ही यह खत्म हो जायेगा।" वे कहते हैं।

"यहां तक कि मजदूरों को हमसे ज्यादा भुगतान किया जाता है।" सावित्री बुदबुदाते हुए कहती हैं। उनकी आवाज में गुस्सा साफ देखा जा सकता था। वे कहती हैं, "दिन में कम से कम आठ घंटे काम करने के बाद मुझे 126 रुपए मिलता है। इससे ज्यादा मैं नये बन रही बिल्डिगों में मजदूरी करके कमा सकती हूं। मैं कुशल बुनकर हूं लेकिन अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए संघर्ष कर रही हूं।" वे गांव कनेक्शन से कहती हैं।

बुनकर एक दिन में औसतन 250 से 350 रुपए का रुपए की कमाई कर सकते हैं, लेकिन यह निर्भर करता है कि वे कितना जमक्कालम बुन पाते हैं। कई रंगों वाले पारंपरिक जमक्कालम बुनने पर उन्हें 19 से 22 रुपए प्रति स्क्वायर फीट का भुगतान किया जाता है, बॉर्डर या कुछ विशेष करने पर रेट थोड़ा और बढ़ जाता है।

एक दिन में हथकरघा के मुकाबले पावरलूम से तीन से चार गुना ज्यादा उत्पादन होता है। फोटो- पंकजा श्रीनिवासन

जमक्कालम भवानी के बुनकरों की कई पीढ़ियों के लिए आय का मुख्य स्त्रोत रहा है। इसे बुनने के लिए परिवार के सभी सदस्यों को एक साथ काम करना पड़ता है। शक्तिवेल लूम पर अपनी बहन के साथ बैठते हैं। थोड़ी दूरी पर उनकी बुआ चेलम्मा चरखा घुमा रही हैं। "कुछ साल पहले तक मैं भी लूम पर बैठती थी।" वे मुस्कुराते हुए कहती हैं।

"परिवार बिखर रहे हैं। जब तक मेरी दो साल की बेटी बड़ी होगी, तब तक यह सब खत्म हो जाएगा। 47 वर्षीय राजू कहते हैं जो शक्तिवेल के भतीजे भी हैं। "अगर युवा बुनकरों को कुछ भी करघों की तरफ आकर्षित करता है वे खुशी-खुशी उसकी ओर जाएंगे, लेकिन हम उनसे बुनने तक के लिए भी कैसे पूछ सकते हैं जिसके बदले में उन्हें कुछ नहीं मिलने वाला।" राजू कहते हैं।

जमक्कलम पुनर्जीवन

हालाँकि, फैशन तकनीक, कपड़ा प्रौद्योगिकी और कुमारगुरु संस्थान के व्यावसायिक अध्ययन विभाग के छात्रों ने भवानी ब्लॉक के दो गांवों, पेरिया मोलपालयम और आपाकुदाल को चुना हैं जहां वे बुनकरों के साथ जमक्कालम योजना पर काम करेंगे। इससे उम्मीद की एक किरण जरूर दिखी है।

कुमारगुरु संस्थान के सी सर्वानन कहते हैं, "हम खरीदने-बेचने की प्रक्रियाओं के अलावा, सामग्री खरीद, डिजाइन और नये उत्पादों के लिए उनकी मदद करेंगे।" उन्होंने बी पूंगोडी, सहायक प्रोफेसर, बिजनेस स्टडीज और प्राकृतिक फाइबर और हैंडलूम के शोधकर्ता और कई छात्रों के साथ मिलकर पिछले दिसंबर में इस योजना की शुरुआत की। 30 जनवरी को शहीद दिवस के अवसर पर बुनकरों के गाँव आपकुदाल में बुनाई केंद्र स्थापित किया गया था। शक्तिवेल और दूसरे जानकार बुनकर यहां के बुनकरों को प्रशिक्षित करेंगे।


"हमने जेकक्वार्ड बॉक्स पर काम पूरा कर लिया है, जिससे करघा का काम आसान हो जाएगा।" पूंगोडी समझाते हुए कहते हैं। "उत्पादकता बढ़ जाएगी और काम और अच्छा होगा। हम इस हस्तकला में प्राकृतिक रंगों और और बेहतर गुणवत्ता वाले धागे लाना करना चाहते हैं।" पूंगोडी गांव कनेक्शन को बताते हैं। परंपरागत रूप से जमक्कालम के लिए सूती धागा इरोड, करूर और कोयम्बटूर से आता है और वे चन्नीमालई में रंगे जाते हैं जो भवानी से लगभग 35 किलोमीटर दूर है।

इस बीच, पास के मायावर पेरुमल मंदिर में एक भव्य पूजा, कुंभिभिषेकम की तैयारी चल रही है। पेरिया मोलपलायम के देवता को फल, फूल, हल्दी और नारियल चढ़ाते हैं, जो सभी अपने-अपने हिसाब से बुने हुए जमक्कलमों पर खूबसूरती से लाते हैं। हो सकता है वे प्रार्थना करेंगे कि मायावर पेरुमल जमक्कलम को पुनर्जन्म देंगे।

इस खबर को अंग्रेजी में यहां पढ़ सकते हैं

अनुवाद- संतोष कुमार


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