बिहार: आजादी के 74 साल के बाद भी पंचायत चुनाव में राशन का मुद्दा

बिहार में इन दिनों पंचायत चुनाव का आखिरी चरण चल रहा है। इन चुनावों में कई जगह पर राशन कार्ड का मुद्दा छाया हुआ है। बिहार में 52 फीसदी के करीब आबादी गरीबी में जी रही है और कई लोगों के पास आज तक राशन कार्ड नहीं है।

Rahul JhaRahul Jha   4 Dec 2021 10:47 AM GMT

बिहार: आजादी के 74 साल के बाद भी पंचायत चुनाव में राशन का मुद्दा

सुपौल (बिहार)। बिहार के सहरसा जिले के बीरगांव पंचायत के वार्ड नंबर-4 के डोम टोली में लगभग 75 परिवार रहते हैं, जिसमें 30-35 परिवारों के पास राशन कार्ड नहीं हैं। इसमें सभी लोग डोम यानी महादलित समुदाय से आते हैं।

बिहार में राशन कार्ड के मामले में पिछड़ेपन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीरगांव पंचायत के वार्ड नम्बर-4 में खड़े हुए 7 वार्ड मेंबर सदस्यों में 3 के पास खुद का राशन कार्ड नहीं है। ये सिर्फ सहरसा की ही कहानी नहीं है। सुपौल जिले की लौढ पंचायत के वार्ड नंबर-2 के वर्तमान वार्ड सदस्य विन्देश्वरी पासवान के पास अब तक खुद राशन कार्ड नहीं है।

सहरसा जिले में बीरगांव पंचायत के हरिशंकर डोम जो 73 वर्ष के हैं, गांव कनेक्शन को बताते हैं, "हमारे गांव में 75-80 डोम परिवार रहते हैं, जिसमें सिर्फ आधे को सरकार के द्वारा चावल-गेहूं उपलब्ध हो पाता है। ज्यादातर लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं। राशन डीलर बोलता है, मोबाइल पर फॉर्म भरिए, फिर ऊपर से सब कुछ होगा। मतलब कार्ड बनेगा। सभी लोग मोबाइल से फॉर्म तो भर दिए हैं और सरकारी कार्यालय, बस्ती से कोई ना कोई जाते ही रहता है। लेकिन अभी भी बहुत लोगों का कार्ड अटका हुआ है।"

बिहार में इन दिनों पंचायत चुनाव हो रहे हैं। इन चुनावों में राशन कार्ड का मुद्दा गर्माया रहा है। मुखिया और सरपंच से लेकर वार्ड मेंबर तक के कई प्रत्याशी राशन कार्ड के मुद्दे पर ही मैदान में हैं। राशन कार्ड का मुद्दा ग्रामीण इलाकों के उन पंचायतों, गांवों टोला (छोटे गांव) में ज्यादा है जहां दलित वर्ग के लोगों की बाहुलता है।

बिहार की 52 फीसदी आबादी गरीबी में जी रही है। इनमें काफी लोगों के पास राशन कार्ड नहीं है। फोटो- राहुल झा

52 फीसदी गरीब वाले राज्य में करीब एक करोड़ 79 लाख राशन कार्ड

नीति आयोग की नवंबर 2021 में आई "मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स" रिपोर्ट के मुताबिक गरीबी के मामले में बिहार सबसे गरीब राज्य है। बिहार की 52 फीसदी आबादी गरीबी में जी रही है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पोर्टल (NFSA) के अनुसार बिहार में 1,79,07,319 कुल राशन कार्ड धारक हैं, जिनसे 8,71,72,572 लोग लाभान्वित हो रहे हैं। इनमें अंत्योदय अन्न योजना (AAY) के धारकों की संख्या 22,93,357 है, जबकि पीएचएच (Priority House Hold) की संख्या 1,56,13,962 है।

साल 2011 के जनगणना के अनुसार बिहार की जनसंख्या 9.9 करोड़ हैं। वहीं आधार कार्ड बनाने वाली भारत सरकार की इकाई यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (UIDAI) के अनुसार 2020 तक बिहार की जनसंख्या आबादी 12.85 करोड़ हैं। बिहार के आधे से ज्यादा लोग गरीबी में जी रहे हैं, उनमें भी एक बड़ी संख्या उनकी है, जिनके पास राशन कार्ड तक नहीं हैं।

राशन कार्ड क्यों पंचायत चुनाव का मुद्दा?

सहरसा जिले के बघवा पंचायत के नवीन चौधरी पहली बार चुनाव में खड़े हैं। मुखिया पद के उम्मीदवार चौधरी राशन कार्ड के मुद्दे पर ही लोगों से वोट मांग रहे हैं। चौधरी गांव कनेक्शन को बताते हैं, "गांव के विकास को जानना है तो गरीब और पिछड़ों के इलाकों में जाइए। 50 से ज्यादा प्रतिशत लोगों को श्रम कार्ड और 30 से ज्यादा प्रतिशत लोगों को राशन कार्ड भी उपलब्ध नहीं है। यहां के मुखिया अभी तक सिर्फ जाति और बड़े खानदान के नाम पर जीत रहे हैं।"

उधर, सुपौल में लोढ़ पंचायत के वार्ड-6 से हरिभोल यादव निर्विरोध वार्ड सदस्य चुने गए हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक इस जीत के पीछे राशन कार्ड हैं। जबकि इस पंचायत के 7 नंबर वार्ड के लिए 10 प्रत्याशी मैदान में हैं।

लोढ पंचायत के ही शिबू यादव बताते हैं, "वार्ड नंबर 6 में लगभग 80% आदमी का राशन कार्ड और श्रम कार्ड बनाया हुआ है। वहीं वार्ड नंबर 7 का सिर्फ 40 से 50% आदमी का राशन और श्रम कार्ड बनाया हुआ है। इसलिए हम लोग इस बार अपने वार्ड में सदस्य का परिवर्तन (प्रत्याशी बदलेंगे) कर रहे हैं।"

सुपौल जिले कटैया गांव की लीला देवी (53 वर्ष) और रामजी मांझी (63वर्ष), दिव्यांग होने के बावजूद उनका राशन कार्ड 6 महीने पहले बना है। फोटो- राहुल झा

चुनाव के 6 महीने पहले दिव्यांग का मुखिया ने बनवाया राशन कार्ड

सुपौल जिले के पिपरा प्रखंड के कटैया गांव में कई जगह दीवारों पर उम्मीदवारों के पोस्टर लगे हैं। इन पोस्टर में कई वादे किए है। 53 साल की लीला देवी को एक आंख से दिखाई नहीं देता। उनके पति राम जी मांझी (63 वर्ष) को जिंदगी के इस पड़ाव पर 6 महीने पहले ही राशन कार्ड मिला है।

राशन कार्ड का नाम लेते ही लीला देवी कहती हैं, "गिनती भूल चुकी हूं कि कितनी बार मुखिया के दरवाजे पर गई और कितनी बार सरकारी दरबार में। लेकिन चुनाव से 6 महीने पहले मुखिया जी खुद से ही राशन कार्ड बनवा दिए।"

राशन कार्ड बनाने में दिक्कत कहां हैं?

गांव कनेक्शन ने सुपौल और सहरसा जिले में 10-12 राशन डीलर्स से बात की उनके मुताबिक वो जो जिन लोगों के राशन कार्ड बनते हैं वो उन्हें राशन देते हैं, दबे शब्दों में वो राशनकार्ड बनाने में कहीं न कहीं गड़बड़झाले की तरफ इशारा करते हैं।

सुपौल की कटैया पंचायत के एक डीलर अपना नाम ना छापने की शर्त पर गांव कनेक्शन को बताया, "राशन कार्ड बनाते समय घोटाले की नींव रखी जा रही है। मतलब अगर तीन सदस्यों वाले परिवार का मुखिया राशन कार्ड के लिए ऑनलाइन आवेदन करता है, तो किसी का एक नाम छंट जाता है तो किसी का राशन कार्ड का कोई अपडेट भी नहीं मिलता है। शिकायत भी करते हैं, लेकिन उनकी शिकायत पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।"

हालांकि कई डीलर इस बात को मानते हैं कि ऑनलाइन यानी दुकानों पर मौजूद ऑनलाइन ई-पॉश मशीन के प्रयोग और डाटा एंट्री से राशन वितरण धांधली काफी हद तक रुकी है।

सहरसा जिले के बघवा पंचायत के नवीन चौधरी जिनके लिए राशन कार्ड का मुद्दा इस बार अहम है।

सरकारी महकमों के अनुसार सब चकाचक

सुपौल के सब डिविजनल पदाधिकारी मनीष कुमार कहते हैं, "डिजिटल तरीके से राशन कार्ड बनाया जा रहा है। हम लोग क्या कर सकते हैं। अगर फार्म ही गलत तरीके से भरा रहेगा तो हम लोगों को रिजेक्ट करना पड़ता है। आपके पास शिकायत के लिए नंबर उपलब्ध है। आप शिकायत कीजिए देखिए काम कैसे होता है।"

लेकिन फार्म लेने, उसे भरने और जमा कराने ही गरीब और अशिक्षित आबादी के लिए टेढ़ी खीर है। मधेपुरा जिला के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपना नाम न लिखने की शर्त पर कहा, "राशन कार्ड बनवाने के लिए गरीबों को काफी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। किसी का आवेदन तो किसी का आवेदन से नाम छांट दिया जा रहा है।"

जब राशन तो मुखिया या वार्ड मेंबर का भूमिका क्यों बढ़ जाता है?

इस सवाल के जवाब पर सुपौल जिला के लक्ष्मीनिया पंचायत में इस बार नवनिर्वाचित मुखिया रोशन झा बताते हैं, "सिर्फ कहने के लिए ऑनलाइन होता है बाकी काम ऑफलाइन ही है। जिस मुखिया या पंचायत प्रतिनिधि को ऑफिस और सरकारी कागजात का ज्ञान ज्यादा है। या ऑफिस बार-बार जाता है। अफसरों से मिलना जुलना है। वह अपने लोगों का काम जल्दी करवा पाता है।"

सुपौल में बगही पंचायत के आर के मिश्रा जो सीआरपीएफ में आईजी के पद पर कार्यरत थे। वो पहली बार पंचायत चुनाव में वोट देंगे। वह बताते हैं, "इस बीच मैंने नजदीक से चुनाव और गांव के विकास को देखा हूं। जिस जनप्रतिनिधि को सरकारी कागजात और सरकारी ऑफिस में कैसे काम निकाला जाए, इसका हुनर नहीं है। उसके वार्ड में कम काम हुआ हैं, वनिस्पत एक शिक्षित उम्मीदवार के विकास की तुलना में। हालांकि लोग बाद में जाति के नाम पर ही वोट देते हैं।"

कोरोना में बड़ा सहारा बना सरकारी राशन

कोविड लॉकडाउन के दौरान बिहार की एक बड़ी आबादी को आर्थिक दिक्कतों से जूझना पड़ा लेकिन सरकार के द्वारा मिलने वाला मुफ्त राशन इनके लिए बड़ा सहारा बना था। सुपौल समेत कई जिलों में कई बातचीत के दौरान कई लोगों ने माना कि लॉकडाउन में लोगों का रोज़ी-रोज़गार बंद हो गया, भूखों मरने की नौबत आ गई थी। ऐसे में सरकार ने मुफ़्त राशन का जो इंतज़ाम किया है ग़रीबों के लिए वह बेहतरीन क़दम था।

सहरसा के बीरगांव पंचायत की ही राशन कार्ड लाभार्थी आशा देवी बताती हैं, "कोरोना के वक़्त उन्हें छह माह तक ज़्यादा राशन मिला, जिससे परिवार को बहुत राहत हुआ।" हालांकि उनकी शिकायत अभी भी मिलने वाले अनाज की मात्रा और गुणवत्ता को लेकर है।

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